हरदोई, 27 जनवरी(हि.स.) प्रेम रावत मानवता और शांति के विषय पर चर्चा करने वाले अंतर्राष्ट्रीय वक्ता हैं उन्हें इस कार्य के लिए कई देशों में सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा शांतिदूत की उपाधि प्रदान की गई है। यही नहीं, कई देशों के शहरों में उन्हें नगर की चाबियां भी भेंट की गईं, उन्हें लोक सेवा समिति की 26 वीं वर्षगांठ और झारखंड स्थापना दिवस पर वर्ष 2017 का भारत सेवा रत्न से सम्मानित किया गया। अपने संदेश की चर्चा के अलावा भी लोगों को सम्मान शांति और समृद्धि के साथ-साथ जीवन यापन करने में मदद करने के लिए एक परोपकारी संस्था प्रेम रावत फाउंडेशन का भी संचालन करते हैं । इस संस्था के अनेक प्रोजेक्टों में से एक है जन भोजन योजना। इसके तहत जरूरतमंद लोगों एवं बच्चों को रोजाना पोषक भोजन एवं साफ पीने का पानी उपलब्ध कराया जाता है। विश्व भर में लगभग सौ देशों में प्रेम रावत जी का यह संदेश लोग विभिन्न भाषाओं में बड़े ही रुचि से सुनते हैं।
आज करावां में मानवता और शांति संदेश शिविर वीडियो प्रोजेक्टर के माध्यम से प्रेम रावत ने कहा कि एक सच्चाई है कि जीवन में निराशा है तो आशा भी है! यह आपका जीवन है। इस जीवन के अंदर कम से कम कुछ तो अच्छा करें कि इस जीवन में भी आशा का दीपक जल उठे और यह तभी संभव है जब ऐसा मार्गदर्शक मिले जो हमारे अंधेरे जीवन में प्रकाश लेकर आये और हमारी समस्त निराशाओं को आशाओं में बदल दे।
मनुष्य अपने जीवन में सदैव यही आशा करता है कि उसका जीवन सुखमय हो। उसके जीवन में कभी दुःख न आये। परंतु सच तो यह है कि जीवन में सुख-दुःख जीवन भर चलता रहता है। जब दुःख आता है तो मनुष्य निराश हो जाता है, जब सुख आता है तो उसमें इतना खो जाता है कि उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि दुःख दोबारा भी आ सकता है क्याेंकि वह सुख सिर्फ कुछ पल के लिए ही होता है। इसी सुख-दुःख के चक्कर में जीवन पूरा हो जाता है।
जीवन है तो समस्याएं भी हैं। मनुष्य इन समस्याओं से बच नहीं सकता। क्योंकि ये सभी समस्याएं हमारी ही बनाई हुई हैं। समस्याओं का बोझ अमीर-गरीब सबके लिए बराबर है। ये बात अलग है कि ये समस्याएं प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक नया रूप ले लेती हैं, जिससे सभी को दुःख पहुंचता है और दुःखों को झेलते-झेलते मनुष्य में निराशा आ जाती है। बनाने वाले ने हमको यह शरीर दिया है, यह स्वांस दिया है, जो अनमोल है। परंतु हम दुनिया के और चक्करों में फंस जाते हैं और जो सच्चाई हमारे हृदय में स्थित है उससे अंजान रह जाते हैं। हम सोचते हैं कि नौकरी, परिवार, जिम्मेदारियां हैं – यही सब कुछ हमारा जीवन है। लेकिन यह जीवन नहीं है। इस जीवन की अगर कोई कड़ी है तो वह है एक-एक स्वांस जो अंदर आता है और जाता है। जिस दिन इस स्वांस का आना-जाना बंद हो जाएगा, आपका मान-सम्मान, आपके रिश्ते-नाते, आपकी नौकरी, आपका धन-वैभव और वो सारी चीजें, जिनको आप अपना जीवन समझते हैं, वे सब समाप्त हो जाएंगी।
अगर जीवन का कुछ लक्ष्य होना चाहिए, तो वो यह है कि मैं उस चीज को जान लूं, जिसके अभाव में मैं कुछ नहीं हूं और जिसके होने से मैं सब कुछ हूं। अगर मैं उस चीज को नहीं जानता हूं तो मेरा जीवन अधूरा है। क्योंकि इस संसार से जाना सबको है! कब जाना है, यह किसी को नहीं मालूम। परंतु कम से कम कुछ तो अच्छा करें कि इस जीवन में भी आशा का दीपक जल उठे, क्योंकि यह आपका जीवन है। और यह तभी संभव है जब ऐसा मार्गदर्शक मिले जो हमारे अंधेरे जीवन में प्रकाश लेकर आये और हमारी समस्त निराशाओं को आशाओं में बदल दे।
आरेंद्र कुशवाहा, विजय कुमार गुप्ता, जय प्रकाश गुप्ता, करुणाशंकर मिश्रा, मनोज कुमार गुप्ता, पूनम,किरन,मुनेश्वर दयाल मिश्रा, शकुंतला गुप्ता, सुरेश गुप्ता, दुर्गा, स्वामी दयाल कुशवाहा, भैयालाल,राममुरारी कुशवाहा, डाक्टर नागेश्वर शर्मा, धीरसिंह कुशवाहा, रामसागर बाजपेई,ममता मिश्रा, लज्जावती ,बबली सिंह, अशोक गुप्ता, दयाराम, बाबूराम कुशवाहा, विमलेंद्र अवस्थी, सचिन स्वर्णकार, सुधा स्वर्ण, श्याम सिंह पाल,रामपाल पाल, जगपाल कुशवाहा, पूजा शर्मा, बाबूराम शर्मा, शांति कुशवाहा, मांसी सक्सेना,जाग्रति, ब्रजकिशोर, उमावती, विभारानी और कुमकुम गुप्ता आदि लोग मौजूद रहे।