अनूपपुर, 8 मार्च (हि.स.)। पवित्र नगरी अमरकंटक में महाशिवरात्रि पर्व पर लोग दूर- दूर से अमरकठेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि अमरकांठेश्वर महादेव के महाशिवरात्रि के दिन दर्शन तथा पूजन से सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है साथ ही सभी दुख दूर हो जाते हैं।
स्वयंभू शिवलिंग है अमरकठेश्वर महादेव
मां नर्मदामंदिर परिसर में ठीक मॉ नर्मदा के सामने ही स्थापित अमरकांठेश्वर महादेव शिवलिंग जिसके बारे में बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। 1300 वर्ष पूर्व आदि गुरु शंकराचार्य के द्वारा यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग की पूजा अर्चना प्रारंभ की गई थी। इसके साथ ही उन्होंने यहां पर जलहरी का निर्माण किया इसके साथ ही माता गौरी की स्थापना भी यहां पर उनके द्वारा की गई थी।
भगवान शिव को कैलाश पर्वत से भी ज्यादा प्रिय था मैंकल पर्वत
मां नर्मदा मंदिर के पुजारी आचार्य धनेश द्विवेदी ने बताया कि अमरकंटक का मैंकल पर्वत भगवान भोलेनाथ को कैलाश पर्वत से भी ज्यादा प्रिय हैं यहां उन्होंने 87000 वर्ष तक तपस्या की थी। इसके साथ ही उनके दोनों पुत्र श्री गणेश तथा कार्तिकेय का जन्म भी यही हुआ था। महाशिवरात्रि के पर्व पर अमरकंटक आकर नर्मदा स्नान करते हुए अमरकांठेश्वर महादेव की पूजा अर्चना का फल स्वर्ग से भी ज्यादा पुराणों में बताया गया है।
सैकड़ों वर्ष से यहां लग रहा है मेला
पंडित धनेश द्विवेदी ने बताते हैं कि अमरकंटक में महाशिवरात्रि पर्व पर मेले का आयोजन सैकड़ो वर्ष पूर्व से किया जा रहा है। पूर्व के समय में यहां महाशिवरात्रि के पर्व पर राजा और रानी दोनों ही आया करते थे। जिसके लिए यहां पर दो मैदान भी बने हुए हैं जिनको रानी पड़ाव तथा राजा पड़ाव के नाम से जाना जाता हैं। यहां मेले में प्रयागराज, बनारस, बलिया, सहित बिहार से दुकानदार पहुंच करते थे तथा एक महीने तक यहां मेले का आयोजन हुआ करता था। तब आवागमन के साधन में नहीं थे और अमरकंटक के मैंकल पर्वत पर काफी परिश्रम के पश्चात लोग यहां पहुंचते थे।