पंजाब में किसानों द्वारा पराली जलाने के मामले पर सरकार ने सख्ती बढ़ा दी है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब किसानों की समस्याएं और अधिक गहन होती जा रही हैं। मौजूदा परिस्थिति पर किसान हैं कि उन्हें पराली जलाने के विकल्प बताने की आवश्यकता है, ताकि वे इस समस्या का समाधान कर सकें। इसी क्रम में, आज किसान ट्रैक्टरों के साथ अमृतसर के ड्यूटी कमिश्नर कार्यालय पहुंचे और अपनी भलाई के लिए आवाज उठाई। भारती किसान यूनियन एकता सिद्धपुर के संघटन में सैकड़ों किसान ट्रैक्टरों के साथ प्रदर्शन करने आए, ताकि सरकार की नीति का विरोध किया जा सके।
किसानों का कहना है कि उन्हें पराली जलाने के लिए सक्षम नहीं समझा जा सकता, क्योंकि यह उनके लिए एक मजबूरी बन चुकी है। ट्रैक्टरों में भरी गई पराली को लेकर किसान यह आरोप लगा रहे थे कि सरकार द्वारा पराली जलाने के कारण उन पर पर्चे जारी किए जा रहे हैं, जो न केवल अन्याय है, बल्कि नाजायज वसूली का भी एक माध्यम बन चुका है। प्रदर्शन में शामिल किसान नेता डॉ. बच्चतर सिंह कोटला ने कहा कि जिन समस्याओं का सामना वे कर रहे हैं, उन पर कोई ठोस समाधान नहीं मिल रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब तक सरकार स्थायी समाधान नहीं निकालती, तब तक ऐसे प्रदर्शन जारी रहेंगे।
किसान संगठनों का यह भी कहना है कि वे शहरवासियों को असुविधा में नहीं डालना चाहते हैं। लेकिन उनके सामने यह समस्या इतनी जटिल हो गई है कि वे कोई विकल्प नहीं मिलने पर मजबूर होकर पराली जलाने पर विवश हैं। पहले किसान अपनी मेहनत से फसल उगाता है और फिर मंडियों में विभिन्न समस्याओं का सामना करता है। डॉ. कोटला ने सुझाव दिया कि सरकार को प्रति एकड़ 2500 रुपये अनुदान देने चाहिए, ताकि किसान अपनी पराली को सही तरीके से समाप्त कर सकें।
किसानों का यह भी कहना है कि अगर सरकार सही दिशा में कदम उठाती है, तो यह न केवल उनके लिए बल्कि पूरे पंजाब के पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित होगा। पराली जलाने के मामले में सरकार की नीतियों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है, ताकि उन किसानों को भी राहत मिले जो इस समस्या से जूझ रहे हैं।
संक्षेप में, पंजाब में पराली जलाने की समस्या ने एक बार फिर गंभीर रूप धारण कर लिया है। किसानों का आरोप है कि सरकार उनके मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं है। ऐसी स्थिति में, सरकार को चाहिए कि वह उन्हें समाधान प्रदान करे और इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करे। बिना ठोस नीति के, केवल सख्ती बरतने से किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, बल्कि इससे विरोध और बढ़ेगा।