बरनाला विधानसभा के उप चुनाव में आम आदमी पार्टी के भीतर की स्थिति अत्यधिक तनावपूर्ण होती जा रही है। पार्टी के जिला अध्यक्ष, गुरदीप सिंह बाठ, द्वारा पार्टी ने जो उम्मीदवार हरिंदर धालीवाल नामित किया है, उसका वे खुलकर विरोध कर रहे हैं। आज सुबह, उन्होंने जिला योजना बोर्ड के चेयरमैन पद से भी इस्तीफा दे दिया है। उनकी मंशा है कि वे स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें, जिसके संदर्भ में उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया है। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा, “साथियों मिलदे आं जनता की कचहरी च।” यह दर्शाता है कि वे जनता के बीच जाकर अपनी आवाज उठाने के लिए तैयार हैं।
गुरदीप सिंह बाठ को इस उप चुनाव के लिए पार्टी का प्रमुख दावेदार माना जा रहा था, लेकिन पार्टी ने सांसद और पूर्व विधायक गुरमीत सिंह मीत हेयर के करीबी दोस्त, हरिंदर धालीवाल को उम्मीदवार बनाया। इस निर्णय ने बाठ को आहत किया और उन्होंने इसका विरोध करना प्रारंभ कर दिया। पार्टी की ओर से उनके विरोध को शांत करने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन बाठ एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव में उतरने का मन बना चुके हैं।
सोमवार को, बाठ ने अपने गांव कट्टू में पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय ग्रामीणों के साथ एक बड़ी बैठक आयोजित की। इस बैठक के दौरान, उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा की। गौर करने वाली बात यह है कि गांवों के कई नेता और कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय का समर्थन करने के लिए आगे आए। इस समर्थन को देखते हुए, बाठ ने अपना महत्वपूर्ण पद छोड़ने का निर्णय लिया, जिसका स्पष्टीकरण उन्होंने अपनी बैठक में भी दिया।
आम आदमी पार्टी के अंदर चल रहे इस विवाद पर अन्य राजनीतिक दलों की नज़रें भी टिकी हुई हैं। कांग्रेस, बीजेपी और अकाली दल ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। हालांकि बीजेपी ने केवल सिंह ढिल्लों का नाम तय कर लिया है, किंतु किसान संघर्ष के चलते टिकट का औपचारिक ऐलान अभी नहीं किया गया है। इसी तरह कांग्रेस पार्टी भी इस अंदरूनी विवाद के बाद अपने उम्मीदवारों का चयन करेगी। दूसरी ओर, अकाली दल भी गुरदीप सिंह बाठ के संपर्क में रहने के प्रयास कर रहा है, ताकि वे अपने राजनीतिक कदम को मजबूती प्रदान कर सकें।
इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि बरनाला विधानसभा का उप चुनाव एक विशिष्ट राजनीतिक परिदृश्य पर आधारित होगा, जिसमें आम आदमी पार्टी का अंदरूनी संघर्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बाठ का स्वतंत्र चुनावी संघर्ष कितना सफल होता है और अन्य दल किस तरह से इस स्थिति का लाभ उठाते हैं। इन सब बातों का आम मतदाता पर व्यापक असर पड़ेगा, जो चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेगा।