पराली जलाने पर संगरूर प्रशासन की सख्ती, रिमोट सेंसिंग से निगरानी और जुर्माना अनिवार्य!

संगरूर जिले में धान की पराली जलाने के संबंध में सख्त कार्रवाई करने के लिए जिला प्रशासन ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए नई पहल शुरू की है। इस प्रक्रिया की जानकारी देते हुए डीसी संदीप ऋषि ने एक विस्तृत समीक्षा बैठक में कहा कि धान की फसल के कटाई के बाद यदि कोई किसान पराली को जलाता है, तो इसकी सूचना पुलिस को दी जाए। प्रशासन ने इससे संबंधित सभी मामलों पर नजर रखने के लिए पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर लुधियाना से डेटा संग्रह कर रहा है, जिसमें आग लगने की घटनाओं की पहचान की जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

डीसी ने बताया कि यदि धान की पराली जलाने के मामले की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों को चालान के माध्यम से सजा दी जाएगी और पर्यावरण जुर्माना लगाया जाएगा। प्रशासन की रणनीति में जमीन की लाल प्रविष्टियों का भी प्रावधान है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि दुष्प्रभावी गतिविधियों का पता लगाया जा सके।

संदीप ऋषि ने यह भी स्पष्ट किया कि पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए एक कंट्रोल रूम का गठन किया गया है। इसके माध्यम से प्रशासन धान खरीदने वाले किसानों के साथ संपर्क स्थापित कर रहा है, ताकि उन्हें पराली को जलाने से बचने के लिए प्रेरित किया जा सके। डीसी ने कहा कि सभी किसानों को इस दिशा में समझाने के लिए मोबाइल फोन का उपयोग किया जा रहा है। इस संबंध में राजस्व, कृषि और सहकारिता विभागों की टीमें गांवों में जाकर किसानों और उनके परिवारों के साथ समन्वय कर रही हैं।

बैठक में अन्य अधिकारियों के साथ हैं, जिसमें डिप्टी कमिश्नर अमित बैंबी, एसपी पलविंदर सिंह चीमा, और अन्य जिला प्रशासन के उच्चाधिकारी शामिल थे। इस पहल के अंतर्गत, जिला प्रशासन ने समग्र रूप से किसानों को धान की पराली जलाने के विरोध में जागरूक करने का लक्ष्य रखा है। सरकार और प्रशासन की ओर से उठाए गए इन कदमों से उम्मीद जताई जा रही है कि जिले में पर्यावरण को लेकर संवेदनशीलता बढ़ेगी और लोग प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों से बचने के लिए सचेत रहेंगे।

यह पहल न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में कदम है, बल्कि यह किसानों को भी उनकी गतिविधियों के बारे में जागरूक करता है, जिससे वे न केवल खुद बल्कि अपने आस-पास के पर्यावरण की रक्षा भी कर सकें। इस तरह की जागरूकता और प्रयास निश्चित रूप से आने वाले समय में प्रदूषण की समस्या को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।