अमृतसर में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू द्वारा किसान नेताओं की तुलना तालिबान से करने वाले विवाद ने पंजाब के किसानों में आक्रोश पैदा कर दिया है। इस बयान के विरोध में आज किसानों ने रवनीत बिट्टू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला फूंका। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी पंजाब के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह साबरा और महासचिव राणा रणबीर सिंह ठट्ठा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बिट्टू का बयान न केवल अपमानजनक है, बल्कि यह किसानों की मेहनत और संघर्ष को कम आंकने वाला है।
किसान नेताओं ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के उप चुनावों के बाद किसान नेताओं की संपत्तियों की जांच कराने का आश्वासन दिया है। उनका कहना है कि यह जांच केवल किसान नेताओं पर नहीं, बल्कि सांसदों, विधायकों, सेवानिवृत्त और मौजूदा नौकरशाहों और अन्य संबंधित समूहों पर भी होनी चाहिए। उन्होंने माँग की है कि इस जांच को निष्पक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा कराया जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्राकृतिक संसाधनों का समान अधिकार सभी को मिले। इस प्रक्रिया में गरीबों और भूमिहीनों के लिए अधिशेष संपत्तियों का वितरण करने की भी आवश्यकता है।
किसान संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में पंजाब के कई स्थानों पर केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत बिट्टू और केंद्र सरकार का विरोध करते हुए सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। नेताओं ने यह तय किया है कि अगर केंद्रीय मंत्री की टिप्पणियों को अनदेखा किया गया तो भविष्य में और भी सशक्त आंदोलन होंगे। वे सांकेतिक रूप से यह संकेत दे रहे हैं कि यह आंदोलन सिर्फ किसानों के अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए है।
किसान नेताओं ने आगे अपने बयान में कहा कि केंद्रीय मंत्री को यह जरूरी समझना चाहिए कि किसान आत्महत्या केवल आर्थिक दबाव के कारण नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं। उन्होंने हाल के वर्षों में आत्म हत्या के मामलों की संख्या को लेकर चिंता जताई और मंत्री से मांग की कि वे 2000 से 2015 तक द्वारा किसानों को हुए नुकसान का आकलन करें। साथ ही, उन्हें यह भी पता करना चाहिए कि किस प्रकार की नशीली दवाओं की आपूर्ति पंजाब के बंदरगाहों से हो रही है, जिससे युवा पीढ़ी प्रभावित हो रही है।
किसान नेता यह जता रहे हैं कि आने वाले समय में उनके आंदोलन की रणनीति पंजाब और देश भर के किसान संगठनों के बीच विचार-विमर्श के बाद तय की जाएगी। यह स्पष्ट है कि किसान अपनी आवाज को उठाने के लिए किसी भी तरह के संघर्ष से पीछे नहीं हटेंगे और वे एकजुट होकर अपने हक के लिए लड़ाई जारी रखेंगे।