अमृतसर में गेहूं की बुवाई की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन किसानों को डायमोनियम फॉस्फेट (DAP) खाद की खरीद के लिए गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, DAP खाद की बॉटलें प्राप्त करने के लिए किसान सड़कों पर प्रदर्शन भी कर रहे हैं। इस स्थिति में और भी तंगी बढ़ गई है क्योंकि जिले की लगभग 56 सहकारी समितियां या तो पूरी तरह निष्क्रिय हो गई हैं या फिर मार्कफेड के लिए रखी गई बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रही हैं। इस कारण बाजार में DAP की एक बोरी, जिसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 1,350 रुपए है, किसानों को 1,700 से 2,000 रुपए तक में खरीदनी पड़ रही है।
इस किल्लत का फायदा उठाकर कई दुकानदार किसानों पर अतिरिक्त रसायनों को भी क्रय करने के लिए दबाव बना रहे हैं। तरन-तारन जिले के सराय अमानत खान के किसान हरजाप सिंह ने बताया कि कुछ दुकानदार वैकल्पिक उर्वरकों के साथ अनावश्यक चीजों को जोड़कर बेच रहे हैं, जिससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। पिछले वर्ष की बात करें तो राज्य सरकार ने DAP की बिक्री का 60 प्रतिशत हिस्सा सहकारी समितियों और 40 प्रतिशत निजी व्यापारियों को निर्धारित किया था।
लेकिन, अब स्थिति में बदलाव आया है। अटारी के किसान कुलदीप सिंह का कहना है कि खैराबाद सहकारी समिति की निष्क्रियता के कारण उन्हें अब निजी व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उन्हें प्रति बोरी 500 से 700 रुपए अधिक चुकाने पड़ रहे हैं। राज्य सरकार की नीति में बदलाव ने सहकारी समितियों की हिस्सेदारी को 80 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया है, जबकि निजी व्यापारियों की हिस्सेदारी को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया है। इस सबके चलते किसानों की दुकानदारों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे उन्हें अतिरिक्त सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
इस बीच, मुख्य कृषि अधिकारी तजिंदर सिंह ने दुकानदारों को कड़ी चेतावनी दी है कि वो उर्वरकों के साथ अनावश्यक वस्तुओं को मिलाकर न बेचें। उन्होंने किसानों से अनुरोध किया है कि वे हर खरीदारी पर दुकानदारों से बिल अवश्य लें। इसके साथ ही, अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए उर्वरक दुकानों और गोदामों में निरीक्षण किया जा रहा है, ताकि किसानों को इसका लाभ मिल सके और उनकी समस्याओं का समाधान हो सके।
यह स्पष्ट है कि किसानों को DAP खाद की अनियमितता और बढ़ती कीमतों के चलते अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार के हिस्सेदारी में बदलाव और सहकारी समितियों की स्थिति का प्रभावित होना, किसानों की मेहनत पर खतरा डाल सकता है। ऐसे में, समय रहते उचित कदम उठाना आवश्यक है ताकि किसान समुदाय को राहत मिल सके और उन्हें अपनी फसलें उगाने में बाधा न आए।