शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इस बात की जानकारी पार्टी के प्रवक्ता डॉ. दलजीत सिंह चीमा ने सोशल मीडिया (X) पर एक पोस्ट के माध्यम से साझा की। उन्होंने बताया कि सुखबीर बादल ने पार्टी की कार्यसमिति को अपना इस्तीफा सौंपा, जिससे नए अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सके। सुखबीर बादल ने अपने कार्यकाल के दौरान पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के समर्थन के लिए आभार प्रकट किया।
आपको बता दें कि इससे पहले सुखबीर बादल को धार्मिक सजा सुनाई गई थी, जिसमें उन्हें ‘तनखैया’ करार दिया गया था। यह सजा अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह द्वारा सुनाई गई थी। आरोप था कि उन्होंने अपनी सरकार के दौरान डेरा सच्चा सौदा के मुखी राम रहीम को माफी दी और सुमेध सैनी को DGP नियुक्त किया, साथ ही श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों में उचित कार्रवाई करने में असफल रहे। जत्थेदार ने यह भी कहा कि सुखबीर बादल के फैसलों का सिख पंथ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और इससे पंजाब की सिख समाज में गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ।
हाल ही में, एक बातचीत के दौरान अकाली दल ने पूर्व सांसद बलविंदर सिंह भूंदड़ को कार्यकारी प्रधान नियुक्त किया था। यह कदम पार्टी में बगावत का सामना कर रहे नेताओं के बीच संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए उठाया गया। भूंदड़ सुखबीर बादल के निकट के सहयोगियों में से एक माने जाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के अंदर के हालात को नियंत्रित करने और नए नेतृत्व की संभावना को साकार करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
1 जुलाई को अकाली दल का बागी गुट भी श्री अकाल तख्त साहिब पहुंचा, जहां उन्होंने सुखबीर बादल से हुई गलतियों के लिए माफी मांगी। इन गलतियों में डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ शिकायत की वापसी और डेरा मुखी को माफी दिलवाने जैसे तथ्यों का जिक्र किया गया। इसके साथ ही, बेअदबी की घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई न होना भी एक महत्वपूर्ण बिंदु रहा है। ये सब घटनाएँ पार्टी की कमजोर छवि को उजागर करती हैं, और इसी कारण पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की गई।
पिछले विधानसभा चुनावों में हुई हार के बाद सुखबीर बादल की पदवी पर संकट बढ़ गया था। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को न केवल हार मिली, बल्कि पार्टी के अंदर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे। इसके अलावा, 2020 में किसान आंदोलन के दौरान पार्टी की भूमिका भी विवाद का केंद्र बनी। ऐसे में अब जब सुखबीर बादल ने इस्तीफा दिया है, तो इससे पार्टी को नए अध्यक्ष के चुनाव की दिशा में बढ़ने का अवसर मिला है। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यह परिवर्तन राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकता है।