बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित करना माता-पिता का कर्तव्य: स्वामी दिव्यानंद गिरि

बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित करना माता-पिता का कर्तव्य: स्वामी दिव्यानंद गिरि

खूंटी, 21 दिसंबर (हि.स.)। आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन शनिवार को व्यास पीठ से प्रवचन करते हुए स्वामी दिव्यानंद गिरि ने कहा कि जीवन में एक लक्ष्य निर्धारित कर उस दिशा में चलते रहने से वह निश्चित पूरा होता है।

उन्हाेंने कहा कि हमने देखा है कि भागवत में बालक ध्रुव पांच साल की छोटी उम्र में ही आत्मज्ञान प्राप्त करने के लक्ष्य को लेकर चल पड़े। उन्होंने स्वयं से पूछा मैं कौन हूं? उन्होंने जाना कि शरीर तो नश्वर है, मगर जो चैतन्य रहता है उसकी अनुभूति उन्होंने प्राप्त कर ली, क्योंकि उनका संकल्प (लक्ष्य) उन्हें पता था। इसी तरह विद्यार्थी जीवन में माता-पिता अपने बच्चों को विद्या का शुद्ध संकल्प कराएं, जिससे वे उच्च कोटि की विद्या प्राप्त कर सकें। उन्होंने कहा कि बच्चों की प्रतिभा को पहचान कर उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करना माता-पिता का परम कर्तव्य है। शिक्षक को अच्छी शिक्षा देने की जिम्मेदारी देनी चाहिए। गुरुजनों को साधना के मार्ग में अपने शिष्यों को सन्मार्ग प्रदान करना चाहिए, ताकि बच्चे योग्य बने।

उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही यदि शिक्षक अच्छी शिक्षा दें, तो देश में भ्रष्टाचार, अनैतिकता, व्याभिचार, नशा, कुसंगति आदि पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसलिए भागवत पुराण भी है और नित्य नूतन भी है। यही सत्य है और वैज्ञानिकता के आधार पर भी यह प्रमाणिक है। वर्ल्ड मेडिटेशन डे के उपलक्ष्य में रविवार को कथा स्थल में उपस्थित सभी भक्तों को आर्ट ऑफ लिविंग की शिक्षिका कल्याणी शाहदेव के जरिये ध्यान साधना कराया जाएगा। यह जानकारी आर्ट ऑफ लिविंग के टीचर आशु शाहदेव ने दी।

—————