क्या? 261 वर्ष पुराने शिव मंदिर में शिव पुत्र की जगह विराजमान हैं हनुमान जी!

महाशिवरात्रि के पर्व की तैयारी शहर के विभिन्न शिवालयों में पूरी हो चुकी है। इस विशेष दिन पर भगवान शिव का अभिषेक करने के लिए कांवड़ियों ने गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार और अन्य पवित्र स्थलों की यात्रा की। अब वे अपने मन मेंकी गई मनौतियों के साथ शिवालयों में पहुंच चुके हैं, जहां वे गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करेंगे। महाशिवरात्रि पर मंदिरों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और विभिन्न संस्थाओं द्वारा शिवरात्रि महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा। शमशानेश्वर, डालमिया, चौमुखा, 14 महादेव, अर्दनारीश्वर, अग्रेश्वर और तिलकेश्वर जैसे मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी, जिसमें महारुद्र अभिषेक और रुद्राक्ष वितरण जैसे आयोजन शामिल हैं।

बीहड़ भरतपुर के शिव-हनुमान देवालय का विशेष महत्व है, जो प्रमोद कल्याण और भरतपुर बिहारी जी परिक्रमा मार्ग पर स्थित है। यह शिवालय लगभग 261 वर्ष पुराना है और यहां कार्तिकीय के स्थान पर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। पुजारी सुभाष व्यास के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना सन् 1764 में महाराजा जवाहर सिंह द्वारा की गई थी, जब उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए नजीबउद्दौला के खिलाफ चढ़ाई से पहले भगवान शिव की आराधना की। इस दौरान, शिव परिवार में हनुमान जी को विराजित किया गया क्योंकि हनुमान जी रियासत के इष्ट देवता माने जाते थे।

इतिहासकार डॉ. सुधा सिंह ने बताया कि हनुमान जी का चयन इसलिए किया गया क्योंकि वह रियासत के ध्वज पर उपस्थित एक महत्वपूर्ण प्रतीक थे। भगवान शिव को एक भयंकर योद्धा के रूप में देखा जाता है, जबकि हनुमान जी सत्य की रक्षा के लिए संघर्ष का प्रतीक माने जाते हैं। यही कारण है कि महाराजा जवाहर सिंह ने शिव परिवार में हनुमान जी की प्रतिमा को स्थापित करना उचित समझा।

शिवालय की जलहरी से पानी की निकासी के लिए ककैया ईंटों की बनी एक नाली है, जो सुजान गंगा नहर में गिरता है। साथ ही, मंदिर के पास कलात्मक पत्थरों का एक बरामदा भी है, जिसमें रियासत कालीन फव्वारा भी है, हालांकि अब यह क्षतिग्रस्त हो चुका है। क्षेत्रीय विधायक डॉ. सुभाष गर्ग ने मंदिर के महत्व को समझते हुए विधायक कोटे से इसके मरम्मत के लिए 5 लाख रुपये की मंजूरी दी है। देवस्थान विभाग के रिकार्ड के अनुसार, यह मंदिर आत्मनिर्भर श्रेणी का है और सुभाष व्यास परिवार की परंपरा के अनुसार यहां पूजा-सेवा होती आ रही है। इस मंदिर में सावन के चारों सोमवारों और शिवरात्रि के अवसर पर चारों प्रहर पूजा का आयोजन किया जाता है, जिससे भक्तों की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक यह स्थान और भी महत्व प्राप्त करता है।