महाकुंभ के संपन्न होने के बाद, वाराणसी में सभी 7 शैव अखाड़े उपस्थित हैं और इस समय नागा साधुओं के आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ एकत्रित हो रही है। घाट पर स्थित आश्रम में, साधु और महामंडलेश्वर पंचकोशी परिक्रमा और मसाने की होली मनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस विशेष आयोजन के बाद, यह पूछना स्वाभाविक है कि ये अखाड़े आगे कहाँ जाएंगे और नए नागा साधुओं की क्या भूमिका होगी। इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए, दैनिक भास्कर डिजिटल ऐप की टीम ने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी महाराज से बातचीत की।
रविंद्र पुरी महाराज ने स्पष्ट किया कि महाकुंभ के दौरान नागा साधु तब दिगंबर स्वरूप में होते हैं, अर्थात वे निर्वस्त्र रहते हैं। हालाँकि, सामान्य दिनों में वे अपनी पहचान बनाए रखने के लिए भस्म, रुद्राक्ष और जानवरों की खाल पहनते हैं। कुंभ में उपस्थित नागा साधु विशेष रूप से वाराणसी के महापरिनिर्वाण अखाड़ा और पंच दशनाम जूना अखाड़ा से आते हैं, जो कि इस पैसे के लिए उनके दिगंबर स्वरूप का महत्व रखता है। कुंभ खत्म होते ही वे अपने अखाड़ों की तरफ लौट जाते हैं।
महाकुंभ में हजारों नए नागा साधुओं का आगमन हुआ है, जिनका जीवन अब 12 वर्षों की कड़ी तपस्या से भरा रहने वाला है। इन्हें उनके गुरु और थानापति के मार्गदर्शन में रहना होगा, और यदि वे परंपराओं का उल्लंघन करते हैं, तो तुरंत अखाड़े से बाहर कर दिए जाएंगे। नए साधुओं की पहचान वाराणसी में मोर मुकुट, आईकार्ड और कानूनी दस्तावेजों द्वारा की जाएगी, जिन्हें उनके गुरु की अनुमति से वितरित किया जाएगा। उनके गले में सफेद धागे में रुद्राक्ष बांधा जाएगा, जो उनके संन्यास का प्रतीक होगा।
आगे बढ़ते हुए, रविंद्र पुरी महाराज ने बताया कि अखाड़ों में नागा साधु न केवल ध्यान-साधना करते हैं, बल्कि वे धार्मिक शिक्षा का भी प्रचार करते हैं। कई साधु हिमालय के वन क्षेत्र या अन्य एकान्त स्थानों पर तपस्या करते हैं, जहां वे साधारण खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। महाकुंभ के बाद, ये साधु कथा, प्रवचन और सत्संग के माध्यम से गीता, वेद, पुराण और उपनिषदों की शिक्षाओं का प्रचार करते हैं, जिससे समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलती है।
अखाड़ों के आंतरिक प्रशासन के बारे में पूछे जाने पर, महाराज ने बताया कि विभिन्न अखाड़ों में नागा साधुओं का कार्य और उनकी कार्यशैली भिन्न होती है। अखाड़े में सभापति और थानापति जैसे पदों की नियुक्ति की जाती है, जिनका उद्देश्य समाज में सुरक्षा और सत्यता बनाए रखना होता है। नागा साधुओं की कठोर तपस्या देर-सबेर उनके उग्र जीवन को बनाए रखती है, जिससे उन्हें शीत और उष्णता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अंत में, उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में उनकी मुलाकात काशी में होगी जब वे पंचकोशी परिक्रमा करेंगे और इसके बाद अलग-अलग राज्यों में प्रवास करेंगे। महाकुंभ न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि यह आर्थिक ऊर्जा का भी एक स्रोत बन जाता है। महाकुंभ के आयोजन से उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इसकी महत्ता को दर्शाती है।