पंजाब-हरियाणा के शंभू खनौरी बॉर्डर पर चल रहा किसान आंदोलन-2.0 अब एक वर्ष से अधिक समय से जारी है। इस बीच, केंद्र सरकार के साथ किसानों की 7वीं राउंड की बातचीत 19 मार्च को चंडीगढ़ में निर्धारित की गई है। इसके पूर्व, किसानों ने अपने आंदोलन को और तेज करने की योजना बनाई है। जगजीत सिंह डल्लेवाल, जो पिछले कुछ समय से आमरण अनशन पर हैं, 5 मार्च को अपने अनशन के 100 दिन पूरे कर लेंगे। इस अवसर पर, खनौरी मोर्चे पर 100 किसान एक दिवसीय भूख हड़ताल करेंगे। साथ ही, देश के विभिन्न जिलों और तहसीलों में भी भूख हड़ताल का आयोजन किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर खनौरी और रत्नपुरा में महिला किसान महापंचायतें आयोजित की जाएंगी, जो MSP गारंटी कानून के मुद्दे पर केंद्रित होंगी। इस महीने, पूरे देश में प्रदेश स्तर पर भी MSP गारंटी कानून को लेकर महापंचायतों का आयोजन किया जाएगा और इसके लिए सभी कार्यक्रमों का शेड्यूल तैयार किया जा रहा है। इस स्थिति में किसानों ने अपने कानूनी हक के लिए आवाज उठाने का ठान लिया है।
हालांकि, जगजीत सिंह डल्लेवाल की सेहत हाल के दिनों में खराब रही है, लेकिन डॉक्टर्स की टीम की निगरानी में अब उनकी तबीयत में सुधार हो रहा है। डल्लेवाल ने स्पष्ट किया है कि वे मोर्चे पर डटे रहेंगे और खाने का सेवन नहीं कर रहे, बल्कि केवल हरियाणा के किसानों द्वारा लाए गए जल का सेवन कर रहे हैं। हर रोज किसान पानी लेकर उनके पास पहुंच रहे हैं, जिससे उनकी जीविका चल रही है।
किसान आंदोलन के एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद, अभी तक पंजाब के सभी किसान एकजुट नहीं हो पाए हैं। किसानों की एकता को लेकर अब तक छह राउंड की मीटिंग हो चुकी है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं निकल पाया। हाल ही में, 27 फरवरी को चंडीगढ़ में आयोजित एकता मीटिंग भी बेनतीजा रही, जिसमें किसान नेताओं ने छह घंटे तक चर्चा की। हालांकि, मीटिंग के बाद नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जताया कि वे एकता के प्रति बढ़ रहे हैं, लेकिन अब तक अगली बैठक की तारीख तय नहीं की गई है।
इस आंदोलन से कई कलाकार जुड़े हुए हैं एवं सक्रिय रूप से इसमें भाग ले रहे हैं। वहीं, कुछ कलाकारों ने अभी तक दूरी बनाए रखने का विकल्प चुना है। किसानों का मानना है कि यदि सभी एकजुट होकर एक प्लेटफॉर्म पर आएं, तो उनकी मांगें प्रभावी तरीके से उठाई जा सकेंगी। ऐसे में प्रशासन की नीतियों के खिलाफ संघर्ष और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह आंदोलन अब केवल यथास्थिति का विरोध नहीं, बल्कि कृषि और किसान के अधिकारों की एक व्यापक मांग का प्रतीक बन चुका है, जिससे जुड़े किसान अब अपनी आवाज और भी बुलंद करना चाहते हैं।