सबसे बड़े नक्सल विराेधी अभियान में शामिल असिस्टेंट कमांडेंट राजू वाघ यूपीएससी में 871 वीं रैंक के साथ हुए सफल
अभियान से लौटने के बाद मित्रों व परिवार के साथ यूपीएससी में चयन होने की मनाएंगे खुशी
जगदलपुर, 26 अप्रैल (हि.स.)। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के असिस्टेंट कमांडेंट राजू वाघ ने लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा 871 वीं रैंक के साथ सफल हुए हैं। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा पर कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर पिछले पांच दिन से चल रहे अब तक के सबसे बड़े नक्सल विराेधी अभियान का हिस्सा कमांडो राजू भी हैं। उन्होंने बताया कि वे सोमवार अभियान के लिए निकल ही रहे थे, तभी उन्हें जानकारी मिली कि उनका चयन यूपीएससी में हुआ है। अभी उनकी टुकड़ी मुठभेड़ स्थल से लगभग सात किमी की दूरी पर है। अपनी टीम के साथ पांच दिन से जंगल में ही रुके हुए हैं। इस समय दोपहर का तापमान लगभग 42 डिग्री है और गर्म हवाएं भी चुनौतियां बढ़ा रही हैं। वे कहते हैं कि इस समय कर्तव्य प्रथम है। अभियान से लौटने के बाद मित्रों और परिवार के साथ यूपीएससी परीक्षा में चयन होने की खुशी मनाएंगे।
राजू कहते हैं कि चांदामेटा में कैंप स्थापना के दौरान तत्कालीन बस्तर जिले के कलेक्टर चंदन कुमार से मिले तो आईएएस बनकर देश सेवा में योगदान देने की प्रेरणा मिली। डेढ़ वर्ष पहले कनिष्ठ पूर्णिमा से उनका विवाह हुआ, जो वर्धा में मुख्य नगरपालिका अधिकारी हैं। विवाह पश्चात वापस कर्तव्य पथ पर लौटे, उन्हाेने पत्नी से अपने मन की बात कही। इस पर उन्होंने यूपीएससी की तैयारी के लिए प्रोत्साहित किया । साथ देने स्वयं भी पढ़ाई शुरू की । परीक्षा में पूर्णिमा को सफलता नहीं मिली, पर राजू पहले ही प्रयास में सफल रहे । यद्यपि वे कहते हैं कि आईएएस बनने के लिए यह पर्याप्त रैंकिंग नहीं है, पर आगे भी प्रयास करते रहेंगे।
उन्हाेंने बताया कि वर्ष 2020 में सीआरपीएफ असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर चयन हुआ, वर्ष 2021 में पहली पदस्थापना 80वीं बटालियन में होते ही बस्तर जिले के चांदामेटा में सीआरपीएफ की अग्रिम सुरक्षा चौकी (एफओबी) स्थापित करने की जिम्मेदारी मिली। तुलसीडोंगरी की तलहटी में चांदामेटा गांव तब नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना हुआ करता था, जहां ग्रामीणों का भरोसा जीतना बड़ी चुनौती थी। गांव में सामुदायिक पुलिसिंग के तहत ग्रामीणों को दवा, राशन, जरूरत का सामान उपलब्ध कराना शुरू किया और कैंप में ही पाठशाला खोलकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, इससे ग्रामीणों के भरोसे के साथ दिल भी जीता।
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