कश्मीर में 38 साल बाद फिल्म प्रीमियर: ‘ग्राउंड जीरो’ शूट में BSF की असली ग्रेनेड दी!

इमरान हाशमी की नई फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सबसे बड़े मिशन को दर्शाती है। इस फिल्म में इमरान ने बीएसएफ ऑफिसर नरेंद्र नाथ धर दुबे की भूमिका निभाई है, जिन्होंने 2000 से 2003 तक एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन में भाग लिया, जिसमें जैश ए मोहम्मद के कमांडर गाजी बाबा को खत्म किया गया। हाल ही में इस फिल्म का प्रीमियर कश्मीर में तीन दशकों बाद हुआ, जो इस क्षेत्र में सिनेमा के प्रति एक नई उम्मीद जगा रहा है। दिवंगत ऑफिसर की इस कहानी को इमरान ने दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में विस्तार से साझा किया, जिसमें उन्होंने प्रीमियर, अपनी भूमिका की तैयारी और कश्मीर के लोगों के समर्थन का जिक्र किया।

इमरान ने फिल्म के कंटेंट पर बातचीत करते हुए कहा कि ‘ग्राउंड जीरो’ वास्तव में बीएसएफ के बहादुर जवानों की शौर्य गाथा को सिनेमाई रूप में पेश कर रही है। जब पहली बार उन्हें इस कहानी के बारे में बताया गया, तो उन्हें इसकी गहराई और महत्व का एहसास हुआ। उन्होंने बताया कि फिल्म का दृष्टिकोण बताता है कि कैसे बीएसएफ ने दो साल तक इस ऑपरेशन की योजना बनाई, जिसमें कई खतरनाक लम्हों का सामना किया गया। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह कहानी हर भारतीय को जाननी चाहिए क्योंकि यह हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इमरान ने ध्यान दिलाया कि इस मिशन के दौरान बीएसएफ ने कई बलिदान दिए, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी नागरिक की जान नहीं गई। उन्होंने बताया कि युद्ध और सुरक्षा में सैनिकों के परिवारों का भी योगदान होता है, और उनकी कहानियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। ‘ग्राउंड जीरो’ के माध्यम से, अभिनेता दर्शकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि सैनिकों की पत्नियों और परिवारों की भी सच्चाई को समझने की आवश्यकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि साल 2000 से 2003 के बीच जैश ए मोहम्मद संगठन द्वारा फैलाए गए आतंकवाद के कारण देश में स्थिति बहुत गंभीर हो गई थी, लेकिन इस मिशन के बाद काफी लंबे समय तक स्थिति स्थिर रही।

फिल्म के अपने किरदार के लिए इमरान ने बड़ी मेहनत की और उन्होंने बीएसएफ के जवानों के साथ समय बिताकर उनकी ट्रेनिंग और अनुशासन को समझा। उनके अनुसार, शूटिंग के दौरान बीएसएफ के ऑफिसर स्थानीय लोगों के साथ उनकी मदद के लिए हमेशा मौजूद रहे, जिससे उन्हें अपने किरदार को सही तरीके से निभाने में सहायता मिली। उन्होंने कहा, “यह बहुत महत्वपूर्ण था कि हम वास्तविकता के करीब रहकर फिल्म बनाएं, और मैंने इस प्रक्रिया में बीएसएफ के सभी अधिकारियों से बहुत कुछ सीखा।”

कश्मीर में फिल्म प्रीमियर के अनुभव का जिक्र करते हुए इमरान ने कहा कि यह पल भावुक करने वाला था। तीन दशक के बाद किसी फिल्म का प्रीमियर कश्मीर में हुआ था, और इस दौरान उन्होंने वहां की संस्कृति और लोगों की उदारता का अनुभव किया। उन्होंने दर्शकों को यह संदेश दिया कि फिल्में उस क्षेत्र में एक सांस्कृतिक घटना बन सकती हैं, और वे चाहते हैं कि अधिक फिल्म निर्माता कश्मीर में जाकर वहां की वास्तविकता को दर्शाएं। उनका मानना है कि इस तरह के कदम से कश्मीर फिर से सिनेमा का हब बनेगा और लोगों के विचारों में बदलाव आएगा।