वृंदावन के कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय, जिन्होंने केवल 18 वर्ष की आयु में कथावाचन की यात्रा शुरू की, वर्तमान में जोधपुर में हैं। उनका जीवन दृष्टिकोण और आध्यात्मिक संदेश युवा वर्ग के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। इंद्रेश महाराज का कहना है कि “गीता जीवन जीने का तरीका सिखाती है और भागवत मृत्यु को उचित रूप से स्वीकार करना सिखाती है।” यह विचारधारा उन्हें न केवल जीवन और मृत्यु के गूढ़ अर्थों को समझाने में मदद करती है, बल्कि युवाओं का ध्यान भी आकर्षित करती है। हाल ही में, वह जोधपुर के सूरसागर बड़ा रामद्वारा में तीन दिवसीय कथाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे और इस अवसर पर उन्होंने भास्कर ऐप के लिए विशेष साक्षात्कार भी दिया।
उन्होंने बातचीत में कहा कि युवाओं से संवाद स्थापित करते समय उन्हें ऐसा अनुभव होता है जैसे वे अपने ही समकालीन से बात कर रहे हैं। वे अपनी जीवनशैली और समस्याओं को समझते हैं, जिससे उनका सच्चा जुड़ाव बनता है। इंद्रेश महाराज ने यह भी उल्लेख किया कि वह युवाओं के साथ खेल-खेल में संवाद करते हैं, जैसे क्रिकेट, जो उनके और युवाओं के बीच की दूरी को कम करता है। इसके अलावा, इंद्रेश ने यह भी बताया कि कैसे उन्होंने भागवत महापुराण को बचपन में ही अपने पिता से प्रेरणा लेकर पूर्णता तक पहुंचाया।
जब उनसे आधुनिक युवाओं की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि अधिकांश युवाओं के सवाल होते हैं जैसे कि मन की अस्थिरता को कैसे नियंत्रित करें, असफलताओं का सामना कैसे करें, और प्रेम संबंधों में संतुलन कैसे बनाएं। इंद्रेश ने इन मुद्दों का समाधान सरल भाषा में भागवत के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास करने का दावा किया है। उन्होंने बताया कि जीवन किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए जीना चाहिए, जोकि एक महत्वपूर्ण संदेश है।
इंद्रेश उपाध्याय ने मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याओं का सामना कर रहे युवाओं को भी महत्वपूर्ण संदेश दिए। उन्होंने कहा कि जीवन में समस्याएँ, जैसे कि तनाव या ब्रेकअप, आना स्वाभाविक है और ये हमें नई ऊर्जा और दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। उनका मानना है कि रुकावटें जीवन का हिस्सा हैं और उन्हें अवसर के रूप में देखना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने कहा कि यदि युवा तंत्र-मंत्र की दुनिया में जा रहे हैं, तो इसमें भी आध्यात्मिकता की खोज हो सकती है, यही वजह है कि संगठित मार्गदर्शन आवश्यक है।
इंद्रेश ने भविष्य की योजनाओं के बारे में भी बताया। उनका सपना है कि वृंदावन में एक ऐसा गुरुकुल स्थापित हो, जहाँ आध्यात्मिक और आधुनिक शिक्षा का संयोजन हो। उन्होंने बताया कि इस गुरुकुल में संतों का मार्गदर्शन और गौ-सेवा को प्रमुखता दी जाएगी। इसके अलावा, उन्होंने माता-पिता की सेवा को परम महत्व देते हुए कहा कि माता-पिता में भगवान का दर्शन करना चाहिए, क्योंकि यही भारतीय संस्कृति की अमूल्य भावना है। अंत में, उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि भक्ति ही शाश्वत है, इसलिए किसी भी अस्थायी चीज़ से attachment नहीं रखना चाहिए।