रतलाम: चारे-पानी की कमी के कारण भेड़ और ऊंटों के साथ चरवाहे करते हैं सैकड़ो किलोमीटर का सफर

रतलाम: चारे-पानी की कमी के कारण भेड़ और ऊंटों के साथ चरवाहे करते हैं सैकड़ो किलोमीटर का सफर

रतलाम, 1 मई (हि.स.)। इस समय भीषण गर्मी का दौर चल रहा है। खासकर पड़ोसी राज्‍य राजस्थान में चारे-पानी की कमी के कारण चरवाहे मध्यप्रदेश में भेड़-बकरियां और ऊंटों के साथ कई परिवार अपना डेरा अंचल में जमा रहे हैं। वे सैकड़ों किलोमीटर दूर से चलकर मप्र की सीमा में पहुंच रहे हैं। इनके साथ बच्चे भी आए हैं, वैसे तो इन बच्‍चों की उम्र पढ़ने और खेलकूद की होती है, किन्‍तु बच्‍चे भी अपने परिवार के साथ दिखाई दे रहे हैं। राजस्थान के अनूठे चरवाहे कई पीढियों से पुश्तैनी रुप से यह काम कर रहे है।

जानकारी के लिए बता दें कि हर साल सर्दियों के गुजरने के बाद यह चरवाहे राजस्थान से मध्यप्रदेश की ओर प्रवास करते हैं और 4 चार माह तक इनकी जिंदगी का सफर इसी प्रांत में गुजारते हैं। बारिश से पहले वे अपने इलाको में चल देते है ।

इन चरवाहों से हिस प्रतिनिधि रमेश चौधरी ने चर्चा की तो 40 वर्षीय ने बताया वे और उनका परिवार भी बीरमपुर जिला पाली से मध्यप्रदेश के निकला है। वे चार माह तक यही रहेंगे और अपने भेड़ बकरी और ऊट का पालन पोषण करेंगे तथा आषाढ़ माह तक यहा से रवाना हो जाएंगे । गोपाल ने बताया की भेड़ के ऊन ओने पोने दाम पर बिकने के कारण यह सभी संकट मे आ गये है। भेड़ बकरी का दुध इस्तेमाल करते हैं और जो घी बनता है उसको बेचने से थोड़ा बहुत सहारा मिल जाता हैं। चरवाहे बल्लू ने बताया की राजस्थान में बारिश से ठंड की शुरुआत तक चारा उपलब्ध रहता है फिर संकट का दौर शुरू हो जाता है।

हमे मवेशियों को चराने के लिए मालिक सौप देते हैं और इस सफर के दौरान मवेशी कटाई के बाद खाली खेतों में फसलों के अवशेष को खाते हैं।

उस दौरान सैकडो भेड़ और ऊंट जो माल त्याग करते हैं उससे प्राकृतिक खाद भी बन जाता हैं। भेडो़ को खेतों में बैठने के कारण खेतों के मालिक हमे अनाज व अन्य सामग्री भी देते हैं। जिससे हमारा व बच्चो का पेट भरता रहता है इन भेंडो़ को चराने के लिए मवेशी मालिक भी हमे 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह देते हैं। ऊंट तो केवल सामान और वजन को इधर से उधर ले जाने में ।

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