विदेश सचिव विक्रम मिसरी सोमवार को भारतीय संसद की एक संसदीय समिति के सामने भारत-पाकिस्तान के सैन्य संघर्ष से संबंधित जानकारी प्रस्तुत करेंगे। यह जानकारी विशेष रूप से 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद की घटनाओं पर केंद्रित होगी, जिसमें 7 मई की रात को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकवादी ठिकानों पर भारत के द्वारा की गई एयरस्ट्राइक शामिल है। इस ऑपरेशन, जिसे ‘सिंदूर’ नाम दिया गया, में भारत ने 23 मिनट के भीतर 9 आतंकवादी ठिकानों को नष्ट कर दिया और इसके पश्चात पाकिस्तान के एयरबेस को निशाना बनाया गया। इसके बाद, 10 मई को शाम 5 बजे भारत और पाकिस्तान के बीच एक सीजफायर पर सहमति बनी, जिसकी सूचना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने X प्लेटफार्म पर दी थी।
केंद्र सरकार ने 59 सदस्यों वाली एक सात-डेलिगेशन की भी घोषणा की है, जिसमें 51 नेता और 8 राजदूत शामिल हैं। इन डेलिगेशनों का उद्देश्य दुनिया के प्रमुख देशों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सदस्य देशों से मिलकर भारत के ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर संवेदनशील जानकारी साझा करना है। बताया जा रहा है कि विदेश सचिव मिसरी इन डेलिगेशनों को दो चरणों में ब्रीफ करेंगे। डेलिगेशन के विभिन्न समूहों की अध्यक्षता भाजपा और अन्य पार्टियों के नेताओं द्वारा की जाएगी।
कांग्रेस ने सरकार द्वारा डेलिगेशन में केवल एक कांग्रेस नेता, आनंद शर्मा को शामिल करने पर आलोचना की है। कांग्रेस ने कहा कि यह नरेंद्र मोदी सरकार की निष्ठाहीनता को दर्शाता है, जो गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों को सस्ते राजनीतिक खेल में बदल देती है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस संदर्भ में लिखा कि शनिवार को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष के नेता राहुल गांधी से चर्चा की थी, जिसमें 4 सांसदों के नाम मांगे गए थे। इस पर कांग्रेस ने चार नाम दिये थे, लेकिन केवल एक को ही शामिल किया गया।
इस मुद्दे पर AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए पाकिस्तान को आतंकवादियों को प्रशिक्षण, फंडिंग और हथियार मुहैया कराते हुए मानवता के लिए खतरा बताया। ओवैसी ने बताया कि पाकिस्तानी डीप स्टेट और सेना का मुख्य उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करना और समुदायों में विभेदन पैदा करना है। वह डेलिगेशन के साथ बैठक कर विदेशी सरकारों को पाकिस्तान के असली इरादे बताने की योजना बना रहे हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब भारत ने किसी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए विपक्षी दलों का सहयोग लिया हो। अतीत में, 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत का पक्ष रखने के लिए विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में डेलिगेशन को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग भेजा था। इसी तरह, 2008 में मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विभिन्न दलों के डेलिगेशन को विदेश भेजा था, जिसने पाकिस्तान के खिलाफ एक मजबूत कूटनीतिक दबाव उत्पन्न किया था।
इस प्रकार, वर्तमान घटनाक्रम में भारत-पाकिस्तान के संबंधों को लेकर जो तनाव है, उसे संभालने के लिए केंद्र सरकार भारतीय उन्नति के लिए एक ठोस रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है। आपसी सीजफायर और आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण है।