सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में व्यक्त किया कि वह अपने न्यायाधीश के पेशे के बावजूद, पत्रकारिता के प्रति अपनी गहरी रुचि रखते हैं। उनका मानना है कि न्याय के मामलों में तह तक जाना बहुत आवश्यक है, और उन्होंने इसको अपने कार्य का अभिन्न हिस्सा बना लिया है। जस्टिस सूर्यकांत का कहना है कि उन्हें हर केस में तथ्यात्मक जानकारी परखने में दिलचस्पी है, ताकि छिपी हुई जानकारियों को उजागर किया जा सके। उनका यह दृष्टिकोण न केवल न्यायिक प्रक्रिया को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि इससे न्यायालय में पीड़ितों को सही और निष्पक्ष न्याय प्राप्त करने में सहायता भी मिलती है।
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और भविष्य के चीफ जस्टिस बीआर गवई के साथ हुई एक विशेष मुलाकात में जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायालय की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि किसी भी केस में जज को संयमित होना चाहिए, क्योंकि संयम न केवल समस्याओं का समाधान करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रियाओं को भी सुचारु बनाता है। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया, जब एक वकील ने चीफ जस्टिस के सामने ऊँची आवाज में जजों के प्रति आपत्ति जताई, तो उन्होंने उसे पहले अपनी बातें रखने के बाद चाय पर बुलाया, जिससे वकील शांत हो गया और बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ी।
जस्टिस सूर्यकांत ने अदालतों को एक अस्पताल की संज्ञा दी, यह बताते हुए कि जैसे मरीज स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझते हुए डॉक्टर के पास जाते हैं, उसी तरह लोग अन्याय का सामना करने पर अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं। उनके अनुसार, जज का कार्य केवल विवादों का निपटारा करना है, न कि राजनीति में शामिल होना। उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीति से दूर रहकर संविधान द्वारा निर्धारित मूल्यों का पालन करना जजों का प्राथमिक दायित्व है।
सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में जस्टिस यशवंत वर्मा केस से संबंधित एक जांच समिति की चर्चा भी हुई। चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने स्पष्ट किया कि यह जांच समिति गोपनीयता के साथ कार्य कर रही है, और इसमें उनके या कॉलेजियम का कोई हस्तक्षेप नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रिपोर्ट जब तैयार होगी, तब उसे प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर कोई टिप्पणी नहीं की गई। वहीं, जस्टिस बीआर गवई ने मज़ाक करते हुए कहा कि जब उन्हें महाराष्ट्र के खान-पान की याद आती है, तो वे महाराष्ट्र सदन या दिल्ली हाट का रुख करते हैं, जहाँ उन्हें अपने पसंदीदा भोजन का अनुभव मिलता है।
आखिर में, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए श्रीनगर के अहमद तारिक बट्ट के परिवार के छह सदस्यों को पाकिस्तान डिपोर्ट करने पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि जब तक उनके पहचान दस्तावेजों की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक उन्हें वापस नहीं भेजा जाएगा। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने परिवार को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वे दस्तावेज़ वेरिफिकेशन आदेश से संतुष्ट नहीं हैं, तो वे जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। इस निर्णय ने न्यायिक प्रक्रिया के प्रति न्यायपूर्ण दृष्टिकोण को एक बार फिर स्पष्ट किया।