वैश्विक अर्थव्यवस्था का ताना-बाना जितना खुला और परस्पर जुड़ा हुआ दिखाई देता है, उतना ही उसमें छिपा है नीतियों और रणनीतियों का जाल। इन नीतियों में एक अहम और विवादास्पद औजार है, आयात शुल्क यानी टैरिफ, जिसे किसी देश की सरकार विदेशी वस्तुओं पर लगाती है। ये सदियों से व्यापार नीति का केंद्रीय हिस्सा रहा है। इसके माध्यम से कोई भी देश न केवल घरेलू उद्योगों की रक्षा करता है, बल्कि सरकारी राजस्व बढ़ाने का भी जरिया है। किंतु 21वीं सदी में, जब दुनिया “मुक्त व्यापार” और “ग्लोबलाइजेशन” की भाषा बोल रही है, तब टैरिफ मानो यह आर्थिक अधिकार के वर्चस्ववादी प्रतीक के रूप में देखाई देने लगता है।
वस्तुत: हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच इस ‘टैरिफ’ को लेकर जो कूटनीतिक तनाव सामने दिखता है, उसने यह धारणा तोड़ी है कि ‘टैरिफ’ केवल आर्थिक उपकरण है। असल में, यह आज की दुनिया में रणनीतिक, राजनीतिक और वैचारिक टकराव का भी हिस्सा है। और जब खुद अमेरिका, जो वर्षों से मुक्त व्यापार का सबसे बड़ा समर्थक और प्रचारक रहा है, वह आज दुनिया में “टैरिफ किंग” बनकर सामने आता है।
अमेरिका आज अन्य देशों, विशेषकर भारत पर “अत्यधिक टैरिफ” लगाने का आरोप लगा रहा है, तब उसका यह आरोप सभी को इतिहास के पन्नों में झांकने का एक अवसर भी देता है। यदि हम ताजा आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका का औसत टैरिफ (18.4%) भारत (15.98%) से अधिक है। यह तथ्य अमेरिकी दावे को सीधे चुनौती देता है।इसका अर्थ है कि अमेरिका एक साल में लगभग 100 अरब डॉलर अतिरिक्त राजस्व टैरिफ से कमाता है और इसका बोझ अमेरिकी उपभोक्ता पर पड़ता है, जिससे वहाँ महँगाई बढ़ती है। यह महँगाई केवल उच्च वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए समस्या नहीं है, बल्कि मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर भी असर डालती है। हालांकि यह उसके देश का मामला है, उसके हित और अहित अपने हैं किंतु भारत पर फिलहाल अमेरिकी प्रशासन का दबाव है, जिसके तहत भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह अमेरिकी डेयरी उत्पादों, कृषि उपज और आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) फसलों के लिए अपना बाजार खोल दे। स्वभाविक है ऐसे में भारत की केंद्र सरकार को अपने देश के नागरिकों के हित में निर्णय लेना है और वही आज लिया गया दिखता है।
भारत सरकार ने अमेरिकन ट्रम्प प्रशासन को दो टूक शब्दों में बता दिया है कि यह कदम उसके किसानों, डेयरी उद्योग और खाद्य सुरक्षा के हितों के खिलाफ है। भारत का यह रुख केवल भावनात्मक या संरक्षणवादी नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक और सामाजिक आधार पर टिका हुआ है। देश के करोड़ों किसान और डेयरी क्षेत्र के लाखों छोटे उत्पादक अमेरिकी उत्पादों की बाढ़ में बुरी तरह प्रभावित हो सकते थे। यही कारण है कि भारत ने दबाव के बावजूद अपने हितों से आज कोई समझौता नहीं किया है।
हमें यह समझ लेना चाहिए कि अमेरिका के टैरिफ का असर सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं रहता। जब अमेरिका जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उच्च शुल्क लगाता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध ने इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं, मशीनरी और ऑटो पार्ट्स की वैश्विक कीमतें बढ़ा दीं। यूरोपीय संघ को अपनी टैरिफ नीति में बदलाव करने पड़े, ताकि अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे। छोटे देशों को वैकल्पिक बाजार खोजने पड़े, जिससे वैश्विक व्यापार पैटर्न में बदलाव आया।
भारत ने भी इस चुनौती से निपटने के लिए आज रूस के साथ स्थानीय मुद्राओं रुपया और रूबल में व्यापार बढ़ाने का फैसला किया है। इससे न केवल अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी, बल्कि ऊर्जा, रक्षा और कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ेगा। यह कदम आर्थिक स्वायत्तता की दिशा में एक मजबूत संकेत है।
कहना होगा कि भारत के पूर्व राजनयिक विकास स्वरूप ने इस मुद्दे पर जिस स्पष्टता और तथ्यों के साथ बात रखी है, वह कूटनीतिक विमर्श के लिए एक दिशा देती हुई दिखती है। उन्होंने कहा कि औसत टैरिफ दरों के आधार पर अमेरिका “टैरिफ किंग” है, न कि भारत। यह बात न केवल व्यापारिक, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां यह भी एक तथ्य है कि अमेरिकी टैरिफ नीतियां केवल अमेरिका और भारत के बीच का मामला नहीं हैं। ये नीतियां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी व्यापक असर डाल रही हैं। जब अमेरिका उच्च टैरिफ लगाता है, तो वस्तुओं की लागत बढ़ती है, और यह असर अन्य देशों में भी महसूस किया जाता है। वैश्विक व्यापार में जुड़े छोटे और मध्यम देशों को अपनी नीतियां बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
अब प्रश्न यह है कि भारत के लिए आगे की राह क्या हो? तब हमें यही कहना होगा कि केंद्र की मोदी सरकार को चाहिए कि वह अपने टैरिफ ढाँचे को पारदर्शी और तर्कसंगत बनाए रखे।वैकल्पिक बाजारों और मुद्रा तंत्र को मजबूत करे, ताकि डॉलर-निर्भरता घटे। डब्ल्यूटीओ जैसे मंचों पर अपने पक्ष को तथ्य और आंकड़ों के साथ लगातार प्रस्तुत करे। कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों की रक्षा को नीति का आधार बनाए रखे।
यहां यह भी कहना बनता है कि अमेरिका के टैरिफ दबाव का सामना करते हुए भारत ने जो रुख अपनाया, वह दुनिया के लिए एक संदेश है कि वैश्विक दबावों के बावजूद राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने न केवल दबाव को टाल दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि वह अपने फैसले खुद लेने में सक्षम है। निश्चित ही इसका एक पक्ष यह भी है कि भारत का यह रुख भविष्य में अन्य विकासशील देशों के लिए भी प्रेरणा हो सकता है, जो कई बार अमेरिकी दबाव के सामने झुकते हुए दिखाई देते हैं, वे भी यह सीख सकते हैं कि वैश्विक दबाव के बावजूद अपनी नीतियों को अपने हितों के अनुरूप ढालना संभव है, सिर्फ इसके लिए जरूरी इतना भर है कि हम अमेरिका की वर्चस्ववादी सोच के सामने झुके नहीं। भारत तो फिलहाल यही कर रहा है, अन्य देश भी इस रास्ते पर चल सकते हैं।
(लेखक, आर्थिक विश्लेषक और भारतीय मजदूर संघ के पदाधिकारी हैं। )