लोकतंत्रः दुनिया की सबसे अच्छी शासन व्यवस्था

डॉ. लोकेश कुमार

आज विश्व में लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति को शासन में भागीदारी करने का मौका मिलता है। अन्तरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस हर वर्ष 15 सितम्बर को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इसकी स्थापना 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से की गई थी। इसका मुख्य लक्ष्य लोकतंत्र को मजबूत और सुदृढ़ बनाना है। लोकतंत्र का तात्पर्य जनता के शासन से माना जाता है, जिसमें जनता शासन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी निभाती है।

अब्राहम लिंकन के अनुसार लोकतंत्र ‘ जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन है।’ उन्होंने लोकतंत्र को केवल एक राजनीतिक प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे शासन के रूप देखा जो समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित है । ब्रिटिश राजनीतिक दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल का मानना था कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था ही सबसे अच्छी है। लेकिन, सच्चा प्रजातंत्र तो वह है, जिसमें सभी नागरिक प्रत्यक्ष रीति से शासन कार्य में भाग लेते हैं, किन्तु यह प्रयोग संभव नहीं है। वर्तमान दौर में बड़े-बड़े देशों में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र चलना संभव नहीं है। लोकतंत्र में सर्वोत्म शासन अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र या प्रतिनिधिमूलक शासन ही होना चाहिए । यद्यपि यह लोकतंत्र व्यवस्था पूर्णतया दोषमुक्त नहीं है, लेकिन फिर भी उसको अच्छा बनाया जा सकता है।

लोकतंत्र का जन्म यूनान में हुआ है। ईसा से लगभग सात-आठ सौ वर्ष पूर्व यूनानी सभ्यता विकसित हो चुकी थी। यहां सैकड़ों जनसमूह भिन्न-भिन्न घाटियों में जीवन व्यतीत करते थे। ऐसे जनसमूहों के प्रदेशों को नगर राज्य कहा जाता था। यहां के लोगों ने राजनीतिक संगठन कायम किए। नगर राज्य में ग्रामीण एक-दूसरे से पृथक रहकर भी सामुदायिक जीवन व्यतीत करते थे। इनके सामुदायिक हित भी समान रूप से थे। यूनान के एथेंस में प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था थी। यहां के सभी नागरिक एक्लीजिया नामक परिषद में इकट्ठे होकर नगर में शासन व्यवस्था चलाने पर विचार-विमर्श किया करते थे और वहां के सभी नागरिकों को शासन में भागीदारी निभाने का बारी-बारी से मौका मिलता था।

461-629 ई.पू. में एथेंस की प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्नति के शिखर पर विराजमान थी। इस नगर का भू-भाग लगभग 1000 वर्ग मील था। इसकी जनसंख्या लगभग 3-4 लाख के मध्य थी। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. रोमिला थापर कहती है कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के गुण वैदिक काल और 600 ईसवी पूर्व में ही मिलने लगे थे। वर्तमान दौर की संसद की तरह प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था, जो वर्तमान संसदीय व्यवस्था मिलता -जुलता है। ऐसा अनुमान है कि वैदिककालीन ‘सभा ’ जन (कबीला) के वृद्ध लोगों की परिषद रही होगी और समिति सारे जन की एक सामान्य परिषद होगी। जिस कबिला में निर्वाचित राजा नहीं होता था, ये परिषदें, सरकार के कर्तव्यों और अधिकारों का निर्वहन करती थीं।

लगभग 600 ई.पू. हिमालय की तलहटियों में, उनके कुछ दक्षिण और आधुनिक पंजाब में प्रजातंत्र राज्य बसे हुए थे, जबकि भारत के राजतंत्र गंगा के मैदानों में केन्द्रित थे। राजतंत्रों की अपेक्षा प्रजातंत्र व्यक्तिवादी और स्वतंत्र मत के कम विरोधी थे और आगे चलकर महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक रूढ़िमुक्तता का रूप धारण करने वाले दो सम्प्रदायों के नेता प्रजातंत्रों में ही उत्पन्न हुए थे। बुद्ध का सम्बंध शाक्य जन और जैन मत के संस्थापक महावीर का यांत्रिक जन से था। जब भारत देश को स्वतंत्रता मिली सभी ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था अपनाने पर जोर दिया।

भारत में 75 साल से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था बनी हुई है। लेकिन दुर्भाग्य है कि हाल ही के वर्षों में हमारे दो पड़ोसी मुल्कों में लोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ कुछ युवाओं ने हिंसात्मक आन्दोलन करके सरकारों को बेदखल कर दिया। राजनीतिक चिंतक डॉ. धर्मवीर चंदेल कहते हैं कि दुनिया में लोकतंत्र ही अच्छी शासन व्यवस्था है, लेकिन चुनी हुई सरकारों को जनता के हितों के लिए काम करना चाहिए। बहरहाल,यह कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक सरकारें भी अपने देश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक खाई पर लगाम लगाने का प्रयास करें नहीं तो आज का युवा चुनी हुई सरकारों के खिलाफ हो सकता है। दो राय नहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था दुनिया की सबसे अच्छी शासन व्यवस्था साबित होती रही है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)