जनजाति हिंदू नहीं का शोर अब थमना चाहिए!

भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है। यहाँ नदियों से लेकर पर्वत तक, पेड़ों से लेकर पत्थरों तक और देवालयों से लेकर घर-घर तक पूजा की परंपरा है। इस विविधता में जनजातीय समाज की आस्था और उनकी धार्मिक मान्यताएँ भी सम्मिलित हैं। समय-समय पर यह शोर उठता रहा है कि जनजाति हिंदू नहीं हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बयान ने इसी बहस को फिर से हवा दी है। उन्होंने कहा कि वे गर्व से स्वयं को जनजातीय मानते हैं, हिंदू नहीं। लेकिन यह प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच जनजातीय समाज हिंदू धर्म का अंग नहीं है? क्या उनकी पूजा-पद्धति, देवताओं की मान्यता और जीवन की संस्कार-परंपरा हिंदू धर्म से पृथक है? यदि गहराई से देखा जाए तो इसके उत्तर स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि जनजातीय समाज हिंदू जीवनधारा का अभिन्न हिस्सा है और “जनजाति हिंदू नहीं” का यह शोर निराधार है, जिसे अब थम जाना चाहिए।

भारतीय जनजातीय समाज का धार्मिक जीवन प्रकृति-पूजा पर आधारित है। वे पर्वत, नदी, पेड़-पौधे, सूर्य, चंद्रमा, अग्नि और धरती की पूजा करते हैं। किंतु यदि हम हिंदू धर्म की मूल धारा पर दृष्टि डालें तो वही परंपरा वहाँ भी विद्यमान है। वेदों में “आदित्य”, “वरुण”, “अग्नि”, “वायु” और “पृथ्वी” के मंत्र पाए जाते हैं। ऋग्वेद के अनगिनत सूक्त प्रकृति-पूजा के ही उदाहरण हैं। तो क्या प्रकृति-पूजा हिंदू परंपरा से बाहर है? इसका यही उत्‍तर होगा कि बिल्‍कुल नहीं। जनजातीय लोग “बड़ा देव” को मानते हैं, जो उनकी सर्वोच्च सत्ता है। यही अवधारणा हिंदू धर्म में “महादेव” के रूप में दिखाई देती है। दोनों में न केवल ध्वन्यात्मक साम्यता है बल्कि भावगत एकरूपता भी है। वस्‍तुत: आज जो हिन्‍दू-जनजाति विवाद पैदा कर रहे हैं, उन्‍हें यह समझ लेना चाहिए कि यदि जनजातीय समाज हिंदू न होते तब वे इस तरह से देवत्व की उपासना, आहुति और यज्ञ-परंपरा को जीवित न रखते।

एतिहासिक साक्ष्‍य भी इस दृष्टि से देखे जा सकते हैं, भारतीय जीवन दर्शन में रामकथा और महाभारत जैसी राष्ट्रीय महागाथाओं में जनजातीय समाज का स्थान हमेशा से रहा है। शबरी, जिन्होंने अपने जूठे बेर राम को अर्पित किए, वे जनजातीय समाज से थीं। गोंड, भील, कोल, मुंडा जैसे समुदायों का उल्लेख प्राचीन साहित्य में मिलता है। ये सब उस समय भी सनातन धर्म की परंपराओं के सहगामी रहे। यदि ये समाज हिंदू नहीं होते तो राम जैसे अवतार उनके जीवन और लोककथाओं में क्यों उपस्थित होते? क्यों हनुमान जैसे देवता, जिनकी आराधना सबसे अधिक वनवासी और जनजातीय क्षेत्रों में होती है, इनकी आस्था के केंद्र होते? अत: भारतीय जीवन दर्शन में हिन्‍दू ही जनजाति समाज है।

इस तथ्‍य को भी कोई नजरअंदाज नहीं करे, जनजातीय जीवन में अग्नि का विशेष महत्व है। मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार की परंपरा कई समुदायों में है। यदि वे हिंदू नहीं होते तो यह वैदिक संस्कार कैसे बचा रह पाता? भारत की अन्य कई परंपराओं में मृत्यु के बाद दफनाने की प्रथा प्रचलित रही है, लेकिन जनजातीय समाज ने वैदिक पद्धति के अनुरूप चिता संस्कार को अपनाए रखा। यह एक प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वे सनातन जीवनधारा के ही अंग हैं।

आज जो लोग कहते हैं कि जनजातीय समाज हिंदू नहीं है, वे शायद इस सच्चाई को अनदेखा कर रहे हैं कि हिंदू धर्म कोई संकुचित धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह शैली है जिसमें अनगिनत विविधताएँ समाहित हैं। यह केवल मंदिरों और मूर्तियों तक सीमित नहीं है। यह उन वनों, नदियों और पर्वतों तक फैला है जहाँ जनजातीय समाज बसता है। हिंदू धर्म का अर्थ ही है, उस जीवनधारा से जुड़ना, जो इस भूखंड पर सदियों से बह रही है। इसलिए जनजातीय समाज को हिंदू धर्म से अलग दिखाने की कोशिश न तो ऐतिहासिक दृष्टि से उचित है, न सांस्कृतिक दृष्टि से और न ही ज्ञान के नजरिए से।

यह भी सच है कि बीते कुछ दशकों से मिशनरी गतिविधियों के माध्यम से जनजातीय समाज को धर्मांतरण की ओर धकेला गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता के नाम पर उनका ब्रेनवॉश किया गया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में अनेक गाँवों में धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आई हैं। कहीं पैसों का लालच दिया गया, कहीं अस्पताल और स्कूल के बहाने उनका विश्वास जीता गया। यह सब उसी नीति का हिस्सा है, जो जनजातीय समाज को उनकी जड़ों से काटकर पश्चिमी धर्मों से जोड़ना चाहती है। किंतु यह प्रक्रिया तभी सफल होती है जब पहले यह प्रचार किया जाता है कि “आप हिंदू नहीं हैं।” इसलिए यह नारा केवल एक धार्मिक विमर्श नहीं, बल्कि राजनीतिक-सामाजिक षड्यंत्र का हिस्सा है।

राजनीति भी इस बहस में सक्रिय रूप से जुड़ गई है। उमंग सिंघार जैसे नेता जब कहते हैं कि “हम जनजातीय हैं, हिंदू नहीं,” तो वे केवल अपनी पहचान की बात नहीं कर रहे, बल्कि एक बड़े राजनीतिक एजेंडे को साध रहे हैं। कांग्रेस हो या कोई भी दल, जब वे हिंदू पहचान से दूरी बनाने की कोशिश करते हैं, तो उसका सीधा प्रभाव सामाजिक ध्रुवीकरण के रूप में सामने आता है। कांग्रेस हिंदुत्व विरोधी है, इस तरह के बयान ये साफ बता देते हैं!

वस्‍तुत: जो यह कृत्‍य कर रहे हैं, वे यह जानें कि इस तरह से वह अपने समाज और देश के साथ ही अन्‍याय कर रहे हैं। जनजातीय समाज न केवल भारत की सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि वह हमारी स्वतंत्रता संग्राम की ध्वजवाहक धारा भी है। बिरसा मुंडा, तांत्या भील, रानी दुर्गावती, सिद्धू-कान्हू जैसे अनेकों आदिवासी नेताओं ने अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान दिया। उन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष किया, विदेशी सत्ता को चुनौती दी। क्या यह सब केवल इसलिए संभव था कि वे अपने आपको भारत और उसकी संस्कृति का अंग मानते थे। यदि वे विदेशी थे, यदि वे अलग पहचान रखते थे, तो वे इस भूमि के लिए प्राण क्यों अर्पित करते? यह उनका धर्म और संस्कृति से गहरा जुड़ाव ही था, जिसने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का अग्रदूत बनाया।

यहाँ यह भी ध्यान देना होगा कि जनजातीय समाज की जीवनशैली और पूजा-पद्धति हमेशा से स्थानीय रही है। वे बड़े मंदिरों और शास्त्रों पर कम, और अपनी लोकपरंपराओं पर अधिक निर्भर रहे हैं। लेकिन यही तो हिंदू धर्म का मर्म है कि वह किसी एक किताब, किसी एक पैगंबर, किसी एक संस्था पर निर्भर नहीं है। वह अनेक परंपराओं और रीति-रिवाजों को आत्मसात करता है। यदि गहराई से देखें तो जनजातीय परंपराएँ, हिंदू धर्म के “लोकधर्म” का जीवंत स्वरूप हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि इस कृत्रिम बहस को समाप्त किया जाए। जो समाज हजारों वर्षों से इसी भूमि की संस्कृति, इसी धर्म के देवताओं और इसी जीवन पद्धति से जुड़ा है, उसे अलग बताना केवल भ्रम फैलाना है। “जनजाति हिंदू नहीं” का नारा उनके मन में संदेह पैदा करता है, उनकी एकता को तोड़ता है और उन्हें बाहरी शक्तियों के प्रभाव में धकेलता है। यही सत्‍य है कि जनजातीय समाज सनातन धर्म का अभिन्न अंग है। वे हिंदू हैं, लेकिन अपनी विशेष परंपराओं और जीवनशैली के साथ वे लोकदेवता के उपासक भी हैं, जिन्‍हीं हिन्‍दू महादेव, शिव, शंभू, बूढ़ादेव, बड़ादेव, भोलेनाथ कहकर पुकारते हैं ।

हिंदू धर्म की महानता इसी में है कि वह किसी भी आस्था को अस्वीकार नहीं करता। गोंड यदि बड़ा देव की पूजा करता है तो वह भी हिंदू है। भील यदि हनुमान को मानते हैं तो वह भी हिंदू है। मुंडा यदि अपनी धरती माता को पूजते हैं तो वह भी हिंदू है। यह विविधता ही हमारी शक्ति है, और यही जनजातीय समाज को हिंदू धर्म का सजीव अंग बनाती है।

इसलिए अब यह शोर थमना चाहिए कि जनजाति हिंदू नहीं है। यह शोर न केवल असत्य है बल्कि खतरनाक भी है। यह शोर विदेशी शक्तियों और राजनीतिक लाभार्थियों के हाथ मजबूत करता है। इसे बंद करने का एकमात्र उपाय है – इतिहास और संस्कृति की सच्चाई को स्पष्ट रूप से सामने रखना। जब यह कहा जाएगा कि शबरी, बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती सब इसी परंपरा के अंग थे; जब यह बताया जाएगा कि अग्नि, सूर्य, धरती, हनुमान और महादेव सब उनके देवता भी हैं; तब यह शोर अपने आप शांत हो जाएगा।

भारत के लिए जनजातीय समाज उसकी आत्मा है। उनकी संस्कृति भारत की संस्कृति है, उनका धर्म भारत का धर्म है। जो उन्हें हिंदू धर्म से अलग करने की कोशिश करता है, वह दरअसल भारत की आत्मा को विभाजित करने की साजिश करता है। इसलिए इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि जनजाति हिंदू हैं और रहेंगे।