ममता की मूरत को सहेजे मंदिर और शिवाला हूँ मैं… : प्रिया

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद वीरेंद्र त्यागी ने जीवन के चलन को अपने काव्य का विषय बनाते हुए मुक्तक “जीने के लिए मरते हैं, और मरने के लिए जिये जाते हैं…” पेश किया। कवि बाबूलाल सागर ने विरह गीत “बैरन पवन चली पुरवाई…” की मनोहारी प्रस्तुति दी। कवि डॉ. राकेश दीक्षित ने श्रृंगार की रचना “तुम्हारी प्रीत की हाला पीकर में झूम लेता हूँ..” पेश की,जिसे श्रोताओं ने करतल ध्वनि से सराहा। कवि सम्मेलन में व्यंगकार जितेंद्र जिद्दी ने हास्य की पैरोडी,ओज के कवि आकाश परमार ने राणा सांगा की वीरता,कवि श्रीराम पटसरिया ने गुरु की महिमा,कवयित्री रजनी शर्मा ने राधा-कृष्ण के शास्वत प्रेम,कवि प्रेम प्रसून ने मां शारदा की भक्ति,कवि अपूर्व माधव ने चंबल की महिमा,कवि श्रीराम गोस्वामी ने गुरु की महिमा,कवि मुरली मनोहर मंजुल ने मानव धर्म तथा कवि विवेक कुशवाहा ने देश प्रेम को समर्पित काव्य पाठ किया।