गहन चोट से शब्दों का अभाव

राष्ट्र स्तब्ध है। देश की सर्वोच्च न्यायपीठ के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने की घटना से जन गण मन आहत है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने अब तक घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। अब उन्होंने कहा है कि, ”जो कुछ हुआ उससे बहुत स्तब्ध था।” मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि उनके सहयोगी न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां ने इससे भिन्न राय प्रकट की है। यह अच्छी बात है कि मुख्य न्यायाधीश ने इसे एक भुला दिया गया अध्याय बताया है, लेकिन देश में इस घटना पर अच्छी खासी बहस है। भुइयां ने कहा है, “इस पर मेरी अपनी राय है। वह भारत के चीफ जस्टिस हैं। यह उच्चतर संस्था का अपमान है।”

राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित इस घटना ने कई दिशाओं में नया सोचने की आवश्यकता प्रकट की है। घटना की गंभीरता का पता इसी बात से चलता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी घटना की निंदा की है। प्रधानमंत्री ने मुख्य न्यायाधीश से व्यक्तिगत बात भी की। देश का बड़ा हिस्सा अवाक् है।

भारतीय राजव्यवस्था की तीन प्रमुख संस्थाएं हैं। विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के मध्य शक्ति के पृथक्करण प्रत्यक्ष हैं। भारतीय न्यायपालिका की प्रतिष्ठा विश्वस्तरीय है। न्यायपालिका विधि की व्याख्या करती है। इसका खूबसूरत इतिहास है। खेदजनक है कि इसी गौरवशाली इतिहास में यह एक आत्महीन अध्याय जुड़ गया है। आगे आने वाली पीढ़ियां इस घटना के विवरण पढ़ेंगीं। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपना मत व्यक्त करने का अधिकार है और यह अधिकार संवैधानिक भी है। इस घटना के आरोपी अधिवक्ता राकेश किशोर को ऐसी विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। यहां प्रश्न अभिव्यक्ति की आजादी का है भी नहीं। यह सीधे आपराधिक कृत्य है।

आदर्श समाज¨में परस्पर सम्मान की प्रकृति स्वाभाविक आवश्यकता होती है। प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, महिमा और निजता के सम्मान से समाज मजबूत होते हैं। भारतीय समाज में ऊंचे आदर्श और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, महिमा का सम्मान हजारों वर्षों की प्राचीन परंपरा है। महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में पक्ष और विपक्ष के संवाद आदर से भरे पूरे हैं। इस घटना से भारत के मन में एक गहन पीड़ा उठी है।

हम अपने बच्चों को सिखाते हैं। उन्हें सभ्यता के संस्कार देते हैं। करणीय-अकरणीय की सूची बताते हैं। युवा मन 15-20 वर्ष से प्रारंभ होता है। परिवार और समाज में इस बात का प्रशिक्षण मिलता है कि अपशब्द से बचना चाहिए। अपशब्द उचित नहीं होते। विद्यालय और कॉलेज जैसे शिक्षण संस्थाएं संस्कारवान पीढ़ी तैयार करते हैं। समाज के सभी रिश्ते नाते प्रेम पूर्ण व्यवहार का ही प्रतिपादन करते हैं। अधिवक्ता की डिग्री सामान्य कागज का टुकड़ा नहीं है। यह किसी भी व्यक्ति को किसी भी अन्य व्यक्ति की तरफ से बोलने का अधिकार देती है। न्यायालय औपचारिक रूप में ही नहीं आदर के योग्य हैं, वे वास्तव में न्याय के मंडप, मंदिर हैं। इसलिए न्यायालय में अधिकृत रूप से प्रवेश करने वाले अधिवक्ता, न्यायमूर्ति आदर के पात्र होते हैं। सभी पद और दायित्व उत्तरदायित्व भी देते हैं। कर्तव्य पालन से समाज सुदृढ़ होते हैं। राष्ट्रजीवन का अधिष्ठान कर्तव्यवाची है। यहां जूता फेंकने वाले अधिवक्ता के बारे में कहा जा सकता है कि उनकी पढ़ाई और योग्यता के बावजूद कोई कमी है। ऐसी योग्यता के बावजूद उनके द्वारा यह कृत्य किया जाना घोर निंदा का विषय है। ऐसे अपराध की निंदा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

अनेक सवाल हैं। समाज अपने बिगड़े सदस्य को ठीक करने के लिए निंदा, आलोचना का प्रयोग करता है। राष्ट्र राज्य अपने बिगड़ैल सदस्यों को दण्ड भी देते हैं। दण्ड व्यवस्था का उद्देश्य स्वतंत्र व स्वाभिमानी नागरिक तैयार करना होता है। कानून और समाज अपने साथ राष्ट्र का यश भी बढ़ाते हैं। यशस्वी राष्ट्र का जन गण मन वैभव से भरा रहता है। भारत भी वैभवशाली राष्ट्र है। सारी दुनिया भारत क¨ एक शक्तिशाली राष्ट्र मानती है। निंदा और आलोचना में कुछ निश्चित शब्दों द्वारा असहमति प्रकट की जाती है। लेकिन यह घटना बड़ी है। गहन आहत राष्ट्र के मन में निंदा और आलोचना के शब्द जल्दी जल्दी नहीं आते। इस चोट ने शब्दों का अभाव पैदा किया है। मूलभूत प्रश्न है कि इन्हें किन शब्दों में निंदित करें? किन शब्दों से आलोचना करें? आखिरकार भारत के राष्ट्र जीवन में कहां पर खोट है, जिसके कारण भाईचारा, परस्पर सम्मान, संस्थाओं का सम्मान और संवैधानिक संस्थाओं का भी सम्मान नहीं हो रहा है। क्या हमारे पास ऐसी नैतिक शक्ति है कि लोग ऐसे अपराधों के बारे में सोचना बंद कर दें। समाज बहुत कुछ देता है। उसके बदले में कुछ लेता भी है। अपने नागरिकों को नैतिकता और परस्पर आत्मीयता सिखाने की जिम्मेदारी समाज की है। समाज के उत्कृष्ट आदर्श का पालन करते रहना हम सबका कर्तव्य है।

भारत का संविधान अनेक अधिकार देता है। संविधान के प्रति आस्था एक बड़ा मुद्दा है। शासन व्यवस्था संविधान से ही पैदा होती है। अपनी बात कहने के लिए हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता। दबी जुबान कहा सजा सकता है कि समाज में असंतोष है। परस्पर अविश्वास का वातावरण है। लोगों में निराशा है। कई बार व्यक्ति को लगता है कि उसकी सही बात भी कोई नहीं सुनता। उसे लगता है कि उसे अपमानित किया जा रहा है, लेकिन इन सब का अर्थ यह नहीं है कि अधिवक्ता जैसे दायित्वों पर होने के बावजूद कोई हिंसक रास्ता अपनाए। असहमति का आदर देश की प्राचीन परंपरा है। असहमत लोग बड़ी-बड़ी क्रांतियां करते हैं, लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ लागू नहीं होता।

समाज का सतत् विकास हुआ है। एक समय अराजकता थी। लोग एक-दूसरे को हरा देने या खत्म करने के लिए आमादा थे। लोकतंत्र की पहली किरण के बारे में अथर्ववेद के ऋषि बताते हैं कि सबसे पहले परिवार संस्था बनी, फिर लगातार विकास करते हुए निर्णय की शक्ति सभा और और समितियों के हाथ आयी। सभा और समिति के लिए कहा गया है कि वे नरिष्टा हैं और समाज का कष्ट दूर करती हैं।

न्यायपालिका की आलोचना स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक वर्षों में कम थी। अब न्यायपालिका की आलोचना होती है। मैंने स्वयं कई आलेखों में न्यायपालिका की आलोचना की है। आलोचना से सुधार का रास्ता भी निकलता है। असहमति, आलोचना, निंदा और भर्त्सना समाज को शक्ति देते हैं। संप्रति न्यायपालिका का कार्य पूरी निष्ठा के साथ चल रहा है। बीच-बीच में असहमतियां भी आती हैं, लेकिन हर नागरिक को अपनी असहमति संवैधानिक दायरे में ही प्रकट करनी चाहिए। ताजा घटना केवल घटना ही नहीं है, यह घटना हमारे जीवन मूल्यों, संवैधानिक आदर्शों पर गहरी चोट है। विद्वान अधिवक्ता भी विधिक रास्ता छोड़कर असंवैधानिक रास्ते पर चलेंगे, तो देश का क्या होगा?

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)