शहर के मोहल्लों और ग्रामीण इलाकों में घरों के आंगन इस अवसर पर रंग-बिरंगे चित्रों से सजाए गए। मिट्टी और गोबर से लीपे आंगनों में यम-यमी की प्रतिमाएं, सर्प-बिच्छू की आकृतियां और शुभ प्रतीक बनाए गए। पूजा-अर्चना के बाद बहनों ने परंपरा के अनुसार इन आकृतियों को प्रतीकात्मक रूप से कूटा, ताकि भाइयों के जीवन से संकट और बुराइयां दूर हों।
रामानुजगंज क्षेत्र में भाई दूज की परंपराएं आज भी अपनी मौलिकता बनाए हुए हैं। यहां की बहनें ‘रगईनी काटने’ की परंपरा निभाती हैं। इस दौरान वे अपनी जीभ पर कांटा चुभाकर भाइयों के जीवन की नकारात्मकता को दूर करने का प्रतीकात्मक संकल्प लेती हैं। यह रस्म भले ही अनोखी हो, पर इसके पीछे भाई की सुरक्षा और दीर्घायु की गहरी भावना निहित रहती है।
पूरे दिन नगर में भाई-बहन के बीच स्नेहभरे दृश्य छाए रहे। बहनों ने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर आरती उतारी और मिठाई खिलाई, वहीं भाइयों ने भी प्रेम और आदर से उपहार देकर बहनों को खुश किया। घर-घर में गीत-संगीत की गूंज रही और हंसी-खुशी का माहौल बना रहा।
उल्लेखनीय है कि, रामानुजगंज और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मनाया गया भाई दूज न केवल रिश्तों की गहराई को दर्शाता है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस जीवंत परंपरा को भी पुनर्जीवित करता है, जिसमें परिवार, प्रेम और आस्था की डोर सबसे मजबूत कड़ी बनकर सामने आती है।