जनस्वास्थ्य बनाम मुनाफ़ा: भ्रामक औषधि प्रचार का बढ़ता जाल

भारतीय समाज में स्वास्थ्य केवल व्यक्ति के अस्तित्व का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों का भी प्रश्न है। संविधान के अनुच्छेद २१ में निहित ‘जीवन के अधिकार’ में स्वास्थ्य का अधिकार निहित है। किंतु जब औषधियों के नाम पर फैलाए जाने वाले झूठे विज्ञापन जनमानस को भ्रमित करते हैं, तब यह अधिकार संकट में पड़ जाता है।

सन् १९५४ में पारित औषधि तथा चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम अर्थात् (डीएमआरए) का उद्देश्य ऐसे विज्ञापनों पर नियंत्रण था जो गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, मधुमेह, बांझपन अथवा मानसिक रोगों के उपचार का झूठा दावा करते हैं। परंतु इंटरनेट तथा सोशल मीडिया के आगमन ने इस कानून की शक्ति को लगभग निष्प्रभावी बना दिया है।

आज यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और गूगल जैसे मंचों पर “आयुर्वेद से कैंसर का इलाज”, “३० दिन में डायबिटीज खत्म”, अथवा “डॉक्टर X की हर्बल दवा से चमत्कारी उपचार” जैसे संदेशों की भरमार है। इन विज्ञापनों के पीछे कोई चिकित्सकीय प्रमाण नहीं होता, फिर भी लाखों लोग इन्हें देखकर प्रभावित होते हैं। यह स्थिति केवल कानूनी चुनौती नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक संकट भी है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे अपने एल्गोरिद्म के माध्यम से वही सामग्री बढ़ावा देते हैं जो अधिक क्लिक अथवा लोकप्रियता लाती है। अर्थात् जो जितना सनसनीखेज़ अथवा चमत्कारी दिखता है, वही शीर्ष पर पहुँचता है। परिणामस्वरूप झूठे चिकित्सीय दावे और तीव्रता से फैलते हैं। कंपनियाँ इस प्रक्रिया से भारी आय अर्जित करती हैं, परंतु जिम्मेदारी से बचने हेतु स्वयं को “मात्र मध्यस्थ” घोषित करती हैं।

‘मध्यस्थ प्रतिरक्षा’ की अवधारणा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, २००० के अंतर्गत दी गई थी ताकि सोशल मीडिया अथवा खोज इंजन पर डाली गई सामग्री के लिए उन्हें दायित्व से मुक्त रखा जा सके। परंतु अब यही प्रावधान उन प्लेटफ़ॉर्मों के लिए सुरक्षा कवच बन गया है जो सीधे विज्ञापन प्रसारित करते हैं और उससे लाभ कमाते हैं। जब कोई विज्ञापन “प्रायोजित” अथवा “भुगतान किया गया” होता है, तब प्लेटफ़ॉर्म को मात्र मध्यस्थ नहीं माना जा सकता।

भारत में डीएमआरए की प्रवर्तन प्रणाली अत्यंत कमजोर है। इस अधिनियम के तहत दंड के प्रावधान हैं, परंतु न तो कोई विशेष निगरानी संस्था है और न ही डिजिटल विज्ञापनों की जाँच के लिए तकनीकी तंत्र। फलस्वरूप, उल्लंघनकर्ता आसानी से बच निकलते हैं। अनेक बार जब कोई शिकायत दर्ज होती है, तब तक वह विज्ञापन हटाकर नया अभियान आरंभ कर दिया जाता है।

इसके विपरीत अमेरिका, यूरोप तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में डिजिटल स्वास्थ्य विज्ञापनों पर कठोर नियंत्रण है। वहाँ कंपनियों को हर विज्ञापन की सत्यता का प्रमाण देना पड़ता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी खाद्य तथा औषधि प्रशासन (एफडीए) बिना अनुमति वाले चिकित्सीय दावों पर त्वरित कार्रवाई करता है। वहीं भारत में वही कंपनियाँ “गौमूत्र से कैंसर ठीक” अथवा “एक कैप्सूल में सौ रोगों का अंत” जैसे विज्ञापन निःसंकोच प्रसारित करती हैं। यह दोहरा नियामक दृष्टिकोण भारतीय उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।

सीमापार डिजिटल मीडिया ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अधिकांश बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियाँ भारत में कार्य करती हैं, परंतु उनका मुख्यालय विदेश में है। भारत में दिखने वाले विज्ञापनों का संचालन विदेश से होता है। जब कोई नियामक संस्था कार्रवाई करना चाहती है, तब क्षेत्राधिकार की दीवारें आ खड़ी होती हैं। भारत में इन कंपनियों की सहायक इकाइयाँ कहती हैं कि वे केवल विपणन एजेंट हैं, नीति निर्धारण में उनकी कोई भूमिका नहीं। इससे कानूनी जवाबदेही लगभग असंभव हो जाती है।

एल्गोरिद्मिक लक्ष्य निर्धारण भी एक बड़ी समस्या है। विज्ञापन अब स्थिर नहीं रहते — वे उपयोगकर्ता की रुचि, खोज इतिहास और स्थान के आधार पर बदलते रहते हैं। इससे निगरानी, साक्ष्य एकत्रण तथा दंड प्रक्रिया और कठिन हो जाती है। कोई वीडियो अथवा पोस्ट कुछ ही घंटों में गायब हो सकता है, जिससे अपराध सिद्ध करना कठिन हो जाता है।

भारत में कुछ सकारात्मक प्रयास अवश्य हुए हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने २०२२ में भ्रामक विज्ञापनों पर दिशानिर्देश जारी किए हैं तथा प्रसिद्ध व्यक्तियों एवं प्रभावशाली प्रचारकों को भी उत्तरदायी ठहराया है। आयुष मंत्रालय ने भी डीएमआरए के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई की माँग की है। किंतु यह सभी कदम अभी भी सीमित और प्रतिक्रियात्मक हैं। यदि भारत को जनता के स्वास्थ्य अधिकार की रक्षा करनी है, तो डिजिटल विज्ञापन नियंत्रण को दृढ़ता से लागू करना होगा। इसके लिए कुछ आवश्यक सुधार निम्नलिखित हैंः

-पहला, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों को “मात्र मध्यस्थ” नहीं, बल्कि “प्रकाशक” के रूप में परिभाषित किया जाए ताकि वे प्रसारित विज्ञापनों की सामग्री के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी हों।

-दूसरा, डीएमआरए उल्लंघन को ‘गंभीर अपराध’ की श्रेणी में लाया जाए और इसके तहत कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाएँ।

-तीसरा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित स्वचालित निगरानी तंत्र विकसित किया जाए जो प्रतिबंधित दावों वाले शब्दों अथवा चित्रों को स्वतः पहचानकर रोक सके।

-चौथा, सीमापार दायित्व सुनिश्चित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग का ढाँचा बनाया जाए ताकि भारत में प्रसारित विज्ञापनों के लिए विदेशी कंपनियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सके।

-पाँचवाँ, जन-जागरूकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जब तक नागरिक स्वयं झूठे विज्ञापनों की पहचान नहीं करेंगे, तब तक कोई कानून प्रभावी नहीं हो सकता।

डिजिटल युग में औषधि विज्ञापन केवल व्यापार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का प्रश्न है। भारत को प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दायित्व-आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा। बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के लाभ से ऊपर जनता के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही संविधान प्रदत्त ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ की सच्ची रक्षा होगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)