सागर, 24 जनवरी । यह एक अत्यंत हृदयविदारक घटना है जो आधुनिक व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पवन साहू की व्यथा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस विवशता का प्रतीक है जहाँ एक इंसान अपनी जीवनसंगिनी को बचाने के लिए हाथ ठेले को ही एम्बुलेंस बनाने पर मजबूर हो जाता है।
बड़े-बड़े दावों के बीच ऐसी तस्वीर
डिजिटल इंडिया और सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच मध्य प्रदेश के सागर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक बेबस पति अपनी बीमार पत्नी को इलाज के लिए हाथ ठेले पर लिटाकर अस्पताल ले जा रहा था, लेकिन सिस्टम की सुस्ती और गरीबी की मार के चलते अस्पताल की दहलीज चूमने से पहले ही पत्नी ने दम तोड़ दिया।
ठेला बना एम्बुलेंस
गरीबी बनी काल
मूल रूप से ललितपुर के सौंरई निवासी पवन साहू पिछले 12-13 वर्षों से सागर में रहकर सब्जी बेचकर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। पवन ने बताया कि उनकी पत्नी पार्वती साहू लंबे समय से बीमार थीं। सब्जी बेचकर जो भी जमा पूंजी जोड़ी थी, वह इलाज की भेंट चढ़ गई। आर्थिक तंगी इस कदर हावी थी कि एम्बुलेंस बुलाने या निजी वाहन करने के लिए उनके पास पैसे नहीं बचे थे। विवश होकर पवन ने उसी हाथ ठेले को सहारा बनाया जिससे वह सब्जियां बेचते थे। उन्होंने अपनी पत्नी को ठेले पर लेटाया और इलाज की उम्मीद में निकल पड़े, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
मदद मिलने से पहले ही टूट गई सांसों की डोर
पवन साहू के अनुसार, उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि वे समाज और परिचितों से आर्थिक सहायता मांगने की योजना बना रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि शायद कहीं से मदद मिल जाए और उनकी पत्नी का बेहतर इलाज हो सके। लेकिन मदद के हाथ बढ़ने से पहले ही रास्ते में ही पार्वती की सांसें थम गईं। ठेले पर पड़ी लाश और उसके पास बिलखता पति आज के ‘विकसित’ परिवेश की कड़वी सच्चाई बयां कर रहा है।
प्रशासनिक तंत्र और सामाजिक विफलता पर सवाल
यह घटना न केवल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता को दर्शाती है, बल्कि हमारे समाज की संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
स्वास्थ्य मिशन का क्या हुआ? क्या सरकारी एम्बुलेंस सेवाएं केवल कागजों तक सीमित हैं? गरीबों के लिए योजनाएं कहाँ हैं? आयुष्मान कार्ड और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ऐसे समय में पवन जैसे लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? भीड़भाड़ वाले शहर में एक व्यक्ति ठेले पर मरीज को ले जाता रहा, क्या किसी ने रुककर मदद करना जरूरी नहीं समझा?
कड़वी हकीकत
पवन साहू की यह कहानी आज के दौर की उस कड़वी हकीकत का दस्तावेज है, जहाँ इलाज के अभाव में एक गरीब अपनी सबसे कीमती पूंजी खो देता है। जब तक स्वास्थ्य सेवाएं अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के लिए सुलभ नहीं होंगी, तब तक विकास के सारे दावे खोखले ही नजर आएंगे।
हिन्दुस्थान सामचार/मनीष कुमार चौबे