जयपुर, 16 फरवरी । राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश की सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों के लिए 20 हजार करोड रुपए की जरूरत होने के बावजूद बजट में नाममात्र का प्रावधान करने पर नाराजगी जताई है। इसके साथ ही अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार अन्य कामों के टेंडर जारी कर रही है, लेकिन स्कूलों के लिए पैसा नहीं दिया जा रहा। ऐसे में क्या हम स्वास्थ्य सेवाओं को छोडक़र अगले एक साल के लिए अन्य कामों का टेंडर जारी करने पर रोक लगा दें। अदालत ने कहा कि हम एक कमेटी गठन पर विचार करेंगे, जो काम को मॉनिटर करेगी। इसके साथ ही अदालत ने मामले की सुनवाई 5 मार्च को तय की है। जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने यह आदेश झालावाड़ में हुए स्कूल हादसे के बाद लिए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान पर सुनवाई करते हुए दिए।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि बजट में स्कूल की मरम्मत के लिए करीब 550 करोड रुपए और नए भवनों के लिए करीब 450 करोड रुपए का प्रावधान किया गया है। इसी तरह 200 करोड का बजट स्कूलों में लैब के लिए दिया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि पूर्व की सुनवाई में स्कूलों के लिए बीस हजार करोड रुपए की जरूरत बताई गई थी। बजट की यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अदालत ने कहा कि यह देखें कि स्कूलों के लिए डोनेशन, भामाशाह योजना, एमपी-एमएलए फंड का इसके लिए किस तरह उपयोग हो सकता है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिरों में 600 करोड रुपए दान के आ सकते हैं तो शिक्षा का दान भी बडा दान है। इसके साथ ही अदालत ने मामले की सुनवाई पांच मार्च को तय की है।