धर्मशाला, 03 फ़रवरी । हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के पंजाबी एवं डोगरी विभाग द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से श्री गुरु तेग बहादुर की 350वीं शहादत वर्षगांठ के उपलक्ष्य में श्री गुरु तेग बहादुर जी : जीवन, वाणी और शहादत विषयक दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में डा. कृष्णगोपाल सह-सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बतौर मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। वहीं इस मौके पर पद्मश्री आचार्य हरमोहिंदर सिंह बेदी, कुलाधिपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला द्वारा कुलाधिपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
संगोष्ठी के संरक्षक एवं कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल भी मौजूद रहे। इस मौके पर संगोष्ठी के शुभारंभ पर संरक्षक कुलपति प्रो. बंसल ने कहा कि दो दिवसीय इस संगोष्ठी में कई विद्वान अपने विचार रख रहे हैं। यह विश्वविद्यालय का गौरव का पल है। उन्होंने सभी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी द्वारा दी गई शहादत ने भारत की साझा सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। ऐसे अकादमिक आयोजन आत्ममंथन का अवसर प्रदान करते हैं और यह सोचने को प्रेरित करते हैं कि हम आज उनके आदर्शों से क्या सीख सकते हैं। उन्होंने इस मौके पर जल्द ही विश्वविद्यालय में श्री गुरू तेग बहादुर पीठ शीघ्र खोलने की घोषणा की।
इस मौके पर मुख्य वक्ता डा कृष्णगोपाल सह-सरकार्यवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, धार्मिक स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा का शाश्वत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि किसी भी महान व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन तभी संभव है जब उसे उसके समय, परिस्थितियों और सामाजिक संघर्षों के संदर्भ में समझा जाए।
डा. कृष्णगोपाल ने गुरु नानक देव जी से प्रारंभ हुई गुरु परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय समाज को जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्रीय विभाजनों से ऊपर उठाकर एकता, समानता और मानवता का मार्ग दिखाया। संगत, लंगर और धर्मशाला जैसी संस्थाओं के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता का निर्माण हुआ, जिसने आगे चलकर अत्याचार के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध की नींव रखी। जब मुगल शासन के दौरान जबरन धर्मांतरण और धार्मिक दमन अपने चरम पर था, तब गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों सहित समस्त पीड़ित समाज की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह बलिदान किसी एक धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के अधिकारों की रक्षा के लिए था।