बलिया, 02 मार्च । फगुआ यानी होली परम्पराओं के जीवंत होने का त्योहार है। तेजी से आधुनिक हो रहे समाज पर अंग्रेजियत के चटख होते रंगों के बीच बलिया में फाग गायन की परम्परा की डोर और भी मजबूत होती दिख रही है। इसके पीछे युवा जोश है।
होली पर्व के अवसर पर गावों में फाग गायन की परम्परा रही है। हालांकि पालयन का दंश झेल रहे जिले के अधिकांश गावों में समुदायिकता का बोध कराने वाले फाग गायन की परम्परा दम तोड़ रही है। अलबत्ता बलिया के गड़हांचल में फाग गीत गाने की परम्परा परवान चढ़ रही है। गड़हांचल के लगभग मध्य में स्थित सुरही गांव में फाग को जीवंत रखने का बीड़ा लगभग पचास सालों से राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत्त शिक्षक सर्वचन्द्र राय ने अपने कंधे पर ले लिया है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी उन्होंने दर्जन भर उन गावों को फाग गायन के लिए आमंत्रित किया, जहां इस लोक विधा को बुजुर्गों के साए में रहकर युवाओं ने अपना पैशन बना लिया है। सुरही में आयोजित होली मिलन समारोह में बुजुर्गों के मार्गदर्शन में युवाओं ने ऐसा समा बांधा कि लोग देखते ही रह गए। हर साल होने वाले इस आयोजन में बुलाए गए हर गांव के लिए बकायदा नंबर और समय निर्धारित किया जाता है। झाल, मंजीरा, ढोलक और डंफ की थाप के साथ होठों पर भगवान शिव और राम आधारित पारम्परिक गीतों को गाते हुए युवाओं का जोश देख हर कोई हतप्रभ रह जाता है। इस आयोजन में पखवाड़ा भर पहले से तैयारी के बाद गावों की टीमें पहुंचती हैं। इस बार रविवार देरशाम तक चले फाग मुकाबले को देखने हजारों लोग जुटे थे।
आयोजक सर्वचंद्र राय बताते हैं कि इस आयोजन के पीछे युवा पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और परंपरा से जोड़े रखना उद्देश्य है। संतोष जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि आज के युवा डिजिटल क्रांति के बावजूद पुराने फाग गीतों को गाते हुए गर्व महसूस करते हैं।