भगैया सिल्क को जीआई टैग मिलने का रास्ता साफ, केंद्रीय उद्योग मंत्रालय में प्रजेंटेशन को मंजूरी

गोड्डा, 31 मार्च । राज्य के गोड्डा जिले की पहचान बन चुके भगैया तसर सिल्क को जल्द ही भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) मिलने की उम्मीद है। झारक्राफ्ट और नाबार्ड की संयुक्त पहल से इस दिशा में बड़ी सफलता मिली है। केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय में दिए गए प्रजेंटेशन को मंजूरी मिल जाने के बाद अब औपचारिक प्रक्रिया लगभग पूरी मानी जा रही है।

झारक्राफ्ट, भगैया के कोऑर्डिनेटर अब्दुल कादिर ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से लगातार प्रयास के बाद यह उपलब्धि हासिल हुई है। इस पहल में गणेश पीस फाउंडेशन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसने केंद्रीय समिति के समक्ष विस्तृत प्रस्तुति दी।

भगैया सिल्क से जुड़े 20 हजार से अधिक बुनकर परिवारों को इस जीआई टैग का सीधा लाभ मिलेगा। जीआई टैग मिलने से न केवल इस पारंपरिक उत्पाद को कानूनी संरक्षण मिलेगा, बल्कि इसकी वैश्विक ब्रांडिंग भी संभव हो सकेगी। इससे गोड्डा का यह विशेष तसर सिल्क अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अलग पहचान बना सकेगा।

अपनी उत्कृष्ट बनावट और प्राकृतिक चमक के लिए प्रसिद्ध भगैया तसर सिल्क अब वोकल फॉर लोकल के विजन को साकार करते हुए नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। जीआई टैग मिलने के बाद इस उत्पाद की प्रामाणिकता सुनिश्चित होगी, जिससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और ग्राहकों का भरोसा और मजबूत होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस मान्यता से बिचौलियों की भूमिका कम होगी और बुनकर सीधे बाजार से जुड़ सकेंगे। इससे उन्हें अपने हस्तनिर्मित सिल्क साड़ियों और अन्य उत्पादों का उचित और बेहतर मूल्य प्राप्त होगा। साथ ही, यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों, विशेषकर महिला बुनकरों के आर्थिक सशक्तीकरण में अहम भूमिका निभाएगी।

फाउंडेशन के सचिव अमलेश कुमार सिंह ने विश्वास जताया कि शीघ्र ही भगैया सिल्क को आधिकारिक रूप से जीआई टैग मिल जाएगा, जिससे यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कर सकेगा और इसकी मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

स्पष्ट है कि भगैया सिल्क को जीआई टैग मिलना न केवल गोड्डा बल्कि पूरे झारखंड के लिए गर्व की बात होगी, जो पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पहचान देने के साथ-साथ हजारों परिवारों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव लाएगा।