जयपुर, 07 मार्च । राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा है कि दिव्यांगजन अधिकार कानून, 2016 में तय मापदंड पूरे नहीं करने वाला अभ्यर्थी दिव्यांगों के लिए आरक्षित पदों पर नियुक्ति नहीं ले सकता है। इसके साथ ही अदालत ने माना कि तय दिव्यांगता का पुन: परीक्षण कराने के संबंध में राज्य सरकार की ओर से जारी आदेशों को चुनौती नहीं दी जा सकती है। वहीं अदालत ने राज्य सरकार को छूट दी है कि वह तय गाइड लाइन के आधार पर अभ्यर्थी की तय मापदंड का पुन: परीक्षण कर सकती है। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह आदेश पांच दर्जन से अधिक याचिकाओं का निस्तारण करते हुए दिए।
अदालत ने मामले में अपना विस्तृत फैसला देते हुए कहा कि यदि कोई चिकित्सा अधिकारी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 57 के तहत प्रमाण पत्र जारी करने के रूप में नामित नहीं किया गया तो उसकी ओर से जारी प्रमाण पत्र अवैध है और उसके आधार पर किसी तरह का लाभ नहीं लिया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार और भर्ती एजेंसियों को कहा कि वे यह सुनिश्चित करें कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया दिव्यांजन अधिनियम के निर्धारित मानकों के अनुरूप हो। वहीं अदालत ने राज्य सरकार को छूट दी है कि यदि पुन: परीक्षण में सेवारत याचिकाकर्ताओं के पास तय दिव्यांगता नहीं पाई जाए तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी चलाया जा सकता है।
याचिकाओं में अधिवक्ता आमिर खान सहित एक दर्जन से अधिक वकीलों ने कहा कि उनके पास तय चालीस फीसदी से अधिक दिव्यांगता है। उनका मान्यता प्राप्त मेडिकल बोर्ड की ओर से दिव्यांगता का परीक्षण कर प्रमाण पत्र जारी किया गया था और उन्हें नियमानुसार ही दिव्यांग कोटे में नियुक्ति दी गई है। ऐसे में एक बार मेडिकल बोर्ड से प्रमाण पत्र जारी होने के बाद उनकी दिव्यांगता पर शक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा एक प्रशासनिक आदेश जारी कर बीते पांच सालों में दिव्यांग पदों पर नियुक्ति लेने वाले उम्मीदवारों की जांच करना भी गलत है।