प्रयागराज, 02 मार्च । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के प्रमुख सचिव द्वारा अदालत आदेश के अनुपालन में हलफनामा दाखिल न करने पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने इसे न्यायालय के आदेशों के प्रति “पूर्ण अवमानना” करार देते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि आदेशों की अवहेलना पर अफसरों को दंडात्मक कार्यवाही यहां तक कि अवमानना का सामना करना पड़ेगा।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा गया कि क्या माता-पिता एवं सीनियर सिटीजन भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत सीनियर सिटीजन के जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कोई समग्र कार्ययोजना तैयार की गई।
यह आदेश एक 80 वर्षीय महिला गुलाब कली की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। याचिकाकर्ता अस्वस्थ है और अपनी दो पोतियों के साथ रहती हैं, जिनमें से एक शारीरिक रूप से दिव्यांग है। उन्होंने आशंका जताई कि कुछ लोग उनकी पैतृक आबादी भूमि पर अवैध कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं। अदालत ने प्रमुख सचिव से यह भी पूछा था कि अधिनियम, 2007 के तहत जिला मजिस्ट्रेट कमजोर सीनियर सिटीजन की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठा सकते हैं।
अदालत ने पाया कि प्राप्त निर्देशों में केवल अतिरिक्त समय मांगा गया, परंतु कोई ठोस कारण या अब तक उठाए गए कदमों का उल्लेख नहीं था। पीठ ने कहा, “प्रस्तुत निर्देशों में समय विस्तार के लिए कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया गया और न ही अब तक उठाए गए कदमों का खुलासा किया गया। प्रमुख सचिव (गृह) का आचरण इस न्यायालय के आदेश के प्रति पूर्ण अवमानना दर्शाता है, जिसकी कड़ी निंदा की जाती है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब न्यायालय कोई निर्देश देता है तो अधिकारियों के पास केवल तीन विकल्प होते हैं या तो आदेश का पालन करें या कारण बताते हुए शपथपत्र सहित संक्षिप्त प्रार्थना पत्र दाखिल करें या फिर दंडात्मक कार्यवाही के लिए तैयार रहें।
अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब करना न्यायालय की विवशता होती है, क्योंकि नौकरशाही कई बार न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से नहीं लेती। अदालत ने संकेत दिया कि व्यक्तिगत उपस्थिति अवमानना कार्यवाही से कम अपमानजनक है। मामले की गंभीरता देखते हुए अदालत ने प्रमुख सचिव को सात दिन का समय देते हुए जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
साथ ही कार्यवाही का दायरा बढ़ाते हुए भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव तथा उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को भी पक्षकार बनाकर अधिनियम की धारा 22(2) के अनुपालन में उठाए गए कदमों का स्पष्ट विवरण शपथपत्र में देने को कहा। विभाग से मानक कार्यप्रणाली भी अभिलेख पर रखने को कहा गया।
मामले के गुण-दोष पर अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए प्रयागराज के जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह उतरांव थाने के प्रभारी से रिपोर्ट मंगवाएं। थाना प्रभारी को महिला अधिकारी के साथ 80 वर्षीय याचिकाकर्ता से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सुरक्षा की आवश्यकता का आकलन करने और आवश्यक हो तो सशस्त्र पुलिस उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। जिला मजिस्ट्रेट को स्वयं का शपथपत्र दाखिल कर उठाए गए कदमों की जानकारी देने का आदेश भी दिया गया।