काठमांडू, 01 अप्रैल । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण उत्पन्न रासायनिक उर्वरक संकट का सीधा प्रभाव नेपाल में भी आने वाले महीनों में शुरू होने वाले पहले बुआई सीजन पर पड़ने की आशंका है। तनाव शुरू हुए एक महीना बीत जाने के बावजूद स्थिति सामान्य होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं।
कृषि मंत्रालय के अनुसार फिलहाल 1 लाख 37 हजार 663 टन उर्वरक भंडार में मौजूद है, जो आगामी धान रोपाई के लिए सुरक्षित माना गया है। इसके अलावा 45 हजार टन उर्वरक रास्ते में है, जो कुछ ही हफ्तों में नेपाल पहुंचने की उम्मीद है। नेपाल ने 90 हजार टन उर्वरक आयात के लिए प्रक्रिया शुरू किया है, लेकिन आपूर्ति में बाधा और बढ़ती कीमतों के कारण इसे समय पर लाना मुश्किल हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रासायनिक उर्वरक का आयात पूरी तरह बाधित हो गया, तो इससे उत्पादन में गिरावट और फसल नष्ट होने की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि आपूर्ति में आंशिक सुधार हुआ है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण नेपाल पर्याप्त मात्रा में उर्वरक खरीद पाने की स्थिति में नहीं दिखता। कम उत्पादन के चलते अगले वर्ष खाद्यान्न की कीमतों में तेज वृद्धि होना तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव होने पर आपूर्तिकर्ता अक्सर अनुबंध पूरा करने से पीछे हट जाते हैं और ‘परफॉर्मेंस बॉन्ड’ जब्त होने देना ही बेहतर समझते हैं। वर्ष 2019–20 में भी कीमत बढ़ने पर नेपाल के 10 में से 7 आपूर्तिकर्ता समय पर आपूर्ति नहीं कर पाए थे।
नेपाल में धान की रोपाई आमतौर पर जून–जुलाई में होती है और नई सरकार पर जरूरी उर्वरक व कृषि सामग्री उपलब्ध कराने का भारी दबाव है।यदि किसानों ने मक्का जैसी अन्य फसलों में इसका उपयोग नहीं किया, तो धान रोपाई के मुख्य समय में करीब 1 लाख 83 हजार टन उर्वरक उपलब्ध हो सकता है। जबकि तीन महीने के धान सीजन में कम से कम 2 लाख 50 हजार टन उर्वरक की जरूरत होती है।
कृषि सामग्री कंपनी के प्रबंध निदेशक विष्णुप्रसाद पोखरेल के अनुसार पश्चिम एशिया की उर्वरक उत्पादन कंपनियां ‘फोर्स मेज्योर’ दिखाकर बंद हैं, इसलिए पहले से हुए समझौतों के बावजूद आपूर्ति में देरी होगी। नेपाल में उर्वरक आयात करने वाली साल्ट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन के सहायक मुख्य कार्यकारी अधिकारी संकेत भट्टराई ने बताया कि आपूर्तिकर्ताओं द्वारा बताए गए मूल्य में प्रति टन 400 डॉलर तक का अंतर देखा गया है। उन्होंने कहा कि कीमत में अंतर के कारण समय पर उर्वरक आपूर्ति की संभावना बहुत कम है। भट्टराई ने चेतावनी दी कि यदि यह संकट कुछ सप्ताह और जारी रहा और वैकल्पिक उपाय नहीं किए गए, तो धान सीजन के लिए केवल 50 प्रतिशत उर्वरक ही उपलब्ध हो सकेगा।
नेपाल और भारत के बीच 28 फरवरी 2022 को उर्वरक आपूर्ति के लिए 5 वर्षीय सरकारी समझौता हुआ था, जिसकी अवधि मंगलवार को समाप्त हो गई। इसके नवीनीकरण के लिए प्रस्ताव भेजा जा चुका है और भारतीय पक्ष इस पर अध्ययन कर रहा है। कृषि सामग्री कंपनी के अध्यक्ष एवं कृषि मंत्रालय के सहसचिव रामकृष्ण श्रेष्ठ ने कहा कि हम भारत के नजदीकी पड़ोसी हैं, इसलिए समझौता नवीनीकरण के बाद सहयोग मिलने की उम्मीद है। भारत के लिए हमारी मांग बहुत कम है, इसलिए उर्वरक मिलने को लेकर हम आश्वस्त हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उर्वरक संकट से बचने के लिए वैकल्पिक उपायों पर चर्चा जारी है।