42 बीघा भूमि विवाद में आवासन मंडल की जीत

जयपुर, 10 अप्रैल । राजस्थान उच्‍च न्‍यायालय ने बी 2 बाइपास पर स्थित श्रीराम कॉलोनी को लेकर विवादित करीब 42 बीघा जमीन से जुडे मामले में जेडीए की ओर से 29 मई, 1995 को दी गई योजना स्वीकृति और उसके बाद के आदेशों को अवैध माना है। इसके साथ ही अदालत ने 31 जुलाई, 1981 का समझौता विक्रय भी अवैध मानते हुए शून्य घोषित कर दिया है। अदालत ने कहा कि समझौता विक्रय से स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता है। जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने यह आदेश राजस्थान आवासन मंडल की ओर से दायर याचिका को स्वीकार कर निजी व्यक्तियों की ओर से दायर तीन याचिकाओं को खारिज करते हुए दिए।

अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त कोई भी आदेश अंतिम हो तो भी वह अवैध ही होता है। अदालत ने माना की 12 फरवरी, 2002 को एकलपीठ से गलत तथ्यों से आदेश प्राप्त किया गया था, ऐसे में उसे रद्द किया जाता है। अदालत ने साल 1986 की ऑडिट रिपोर्ट और 25 जुलाई, 2019 की जांच समिति रिपोर्ट के आधार पर माना की अधिग्रहण से पूर्व ऐसी कोई योजना अस्तित्व में ही नहीं थी और समिति ने मूल खातेदारों को भी पक्षकार नहीं बनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि खातेदार सिविल कोर्ट में जमा मुआवजा के लिए आवेदन कर सकते हैं और आवासन मंडल भी विधि सम्मत कार्रवाई के लिए स्वतंत्र है।

प्रकरण से जुडे अधिवक्ता दिनेश यादव ने बताया कि साल 1981 में जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति ने खातेदारों से समझौता विक्रय के आधार पर भूमि खरीदने का दावा करते हुए श्रीराम कॉलोनी-बी योजना बनाई। वहीं साल 1990 में इस भूमि का अधिग्रहण कर आवासन मंडल को सौंपी गई। इस दौरान समिति ने जेडीए से नियमितिकरण कराया। इसके बाद पहले चरण का विवाद हाईकोर्ट आने पर अदालत ने साल 2002 में जेडीए को पट्टे जारी करने को कहा और मामला साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट से तय हुआ। इस दौरान साल 2019 में आवासन मंडल ने नई याचिका दायर कर कहा कि साल 2002 का आदेश गलत तथ्यों पर आधारित था।