पलामू में राज्य सरकार की मंईयां सम्मान यात्रा के दौरान गठबंधन में पड़ीं दरारें उजागर
पलामू, 26 सितंबर (हि.स.)। राज्य की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के भीतर की दरारें हाल ही में संपन्न ‘मंईयां सम्मान यात्रा’ के दौरान स्पष्ट रूप से उजागर हो गईं। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन पलामू में भी हुआ, जिसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने प्रमुखता से संभाला। हालांकि, इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की परिवर्तन यात्रा का जवाब देना था लेकिन इसके साथ यह राज्य की गठबंधन राजनीति के बदलते समीकरणों को भी रेखांकित कर गया।
गौरतलब है कि इस सरकारी कार्यक्रम में झामुमो के सिपहसालार ही नजर आये। कांग्रेस और राजद कार्यकर्ताओं ने इससे अपने को दूर ही रखा। हुसैनाबाद विधानसभा क्षेत्र में झामुमो नेताओं की खेमेबाजी भी खुलकर सामने आ गई। एक खेमे का नेतृत्व हाल ही में झामुमो में शामिल जिप उपाध्यक्ष आलोक कुमार सिंह उर्फ टूटू सिंह कर रहे थे तो दूसरे खेमे का बशिष्ठ कुमार सिंह उर्फ बबलू सिंह।
मंईयां सम्मान यात्रा में झामुमो का वर्चस्व स्पष्ट था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो ने इस यात्रा को पूरी तरह से अपनी पकड़ में रखा, जिससे कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल जैसे गठबंधन सहयोगियों की भूमिका लगभग नगण्य हो गई। यात्रा में कांग्रेस की ओर से दीपिका पांडेय सिंह की उपस्थिति थी लेकिन उनकी भूमिका केवल औपचारिकता तक सीमित रही। उनका मुख्य योगदान बस इतना रहा कि उन्होंने अपने पार्टी के जिला अध्यक्ष को मंच पर एक कुर्सी दिलाई, जो कांग्रेस की उपेक्षा का स्पष्ट संकेत था।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की नेता दीपिका पांडेय सिंह ने झामुमो की इस एकतरफा प्रमुखता पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। यह नाराजगी इस बात की ओर इशारा करती है कि कांग्रेस गठबंधन में खुद को कमजोर और उपेक्षित महसूस कर रही है। इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कांग्रेस सिर्फ की ‘शामिल बाजा’ बनकर रह गई है। एक ऐसी भूमिका जिसे निभाने में उसकी खुद की कोई सशक्त पहचान नहीं रह गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राष्ट्रीय जनता दल ने इस यात्रा से पूरी तरह किनारा कर लिया। पलामू प्रमंडल, जो कि राजद के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है और जहां से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सिंह यादव आते हैं, में राजद की अनुपस्थिति को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। राजद का इस महत्वपूर्ण यात्रा में भाग न लेना, न केवल उनकी क्षेत्रीय प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़े करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि झारखंड में गठबंधन की राजनीति में उनकी भूमिका कमजोर होती जा रही है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि झामुमो की उक्त यात्रा कार्यक्रम में राजद की घोर उपेक्षा की गई। हुसैनाबाद विधानसभा क्षेत्र के मोहम्मदगंज, हैदरनगर एवं हुसैनाबाद प्रखंड क्षेत्रों से होकर यात्रा गुजरी जो राजद के प्रदेश अध्यक्ष संजय कुमार सिंह यादव का गृह एवं विधानसभा चुनाव क्षेत्र भी है। यहां से यादव वर्ष 2000 एवं 2009 में चुनावी परचम लहरा चुके हैं। पिछले 2019 के चुनाव में भी श्री यादव दूसरे नंबर पर थे जो 30 हजार से अधिक वोट प्राप्त किया था। राजद की उपेक्षा करना झामुमो को अगले चुनाव में भारी पड़ सकता है।
राजद का इस यात्रा से दूरी बनाए रखना, खासकर जब यात्रा का आयोजन भाजपा की प्रभावशाली परिवर्तन यात्रा के जवाब में किया गया था, गठबंधन की एकजुटता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इस बात की संभावना बढ़ गई है कि आने वाले चुनावों तक यह गठबंधन अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं टिक पाएगा। मइयां सम्मान यात्रा के दौरान सामने आई ये घटनाएं झारखंड की गठबंधन सरकार के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं, जिस तरह से झामुमो ने कांग्रेस और राजद को हाशिये पर रखा, उससे यह साफ है कि गठबंधन के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। आने वाले दिनों में इस गठबंधन की स्थिरता और भी अधिक अनिश्चित हो सकती है, विशेषकर यदि राजद और कांग्रेस ने अपनी नाराजगी को खुलकर जाहिर करना शुरू कर दिया।
कुल मिलाकर, मइयां सम्मान यात्रा ने न केवल सत्ताधारी गठबंधन के भीतर की दरारों को उजागर किया है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि राज्य की राजनीति में आगे की राह कठिन और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यदि गठबंधन सहयोगी दलों के बीच यह असंतोष इसी तरह बढ़ता रहा, तो झारखंड की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
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