पंजाब में चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के चुनाव को लेकर शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने 22 अक्टूबर को अपनी कोर कमेटी की महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया है। यह बैठक चंडीगढ़ के कार्यालय में दोपहर 12 बजे शुरू होगी, जिसमें कार्यवाहक अध्यक्ष बलविंदर सिंह भूंदड़ अगुवाई करेंगे। इस बैठक में विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी, साथ ही किसान भाईयों को मंडियों में धान की खरीद में आ रही समस्याओं पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह उपचुनाव अकाली दल के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, खासकर गिद्दड़बाहा विधानसभा सीट के कारण, जो पार्टी का पारंपरिक गढ़ रहा है।
गिद्दड़बाहा सीट को लेकर शिरोमणि अकाली दल का रुख स्पष्ट है। यह सीट काफी समय से अकाली दल का अभेद्य क्षेत्र रही है, जहां पार्टी ने कई बार सफलता हासिल की है। पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इस सीट से कई बार जीत प्राप्त की है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी में शामिल हुए डिंपी ढिल्लों के घटनाक्रम के बाद से सुखबीर सिंह बादल ने भी इस क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा दी है। हरसिमरत कौर बादल ने खुद इस हलके को संभालते हुए चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं। दल ने स्टीयरिंग कमेटी में हीरा सिंह गाबड़िया को बरनाला शहरी और इकबाल सिंह झूंदा को बरनाला ग्रामीण के प्रचार प्रभारी के रूप में नियुक्त किया है।
सदस्यता की दृष्टि से, गिद्दड़बाहा सीट अकाली दल के लिए संस्थापक समान बनी हुई है। इस सीट पर केवल कांग्रेस ही पांच बार जीत हासिल कर पाई है, इसके अतिरिक्त अकाली दल भी यहाँ कई बार विजयी रहा है। फिलहाल, इस हलके की जिम्मेदारी पूरी तरह से बादल परिवार ने संभाल रखी है। इससे पहले, SAD के संसदीय बोर्ड ने गिद्दड़बाहा को छोड़कर सभी अन्य सीटों का दौरा किया और वहां की स्थिति के बारे में फीडबैक एकत्र किया।
अगर संभावित उम्मीदवारों की बात की जाए, तो डेरा बाबा नानक से सुच्चा सिंह लंगाह की चुनावी दावेदारी की चर्चा चल रही है, क्योंकि उन्होंने हाल में अकाली दल में लौटने का फैसला लिया है। गिद्दड़बाहा के लिए सुखबीर बादल के नाम की भी चर्चा हो रही है। वहीं बरनाला में कुलवंत सिंह कांता को उम्मीदवार बनाया जा सकता है, जिन्होंने पिछले चुनाव में 25 हजार वोट हासिल किए थे। इसके साथ ही, होशियारपुर में भी कई नेता पद के लिए दौड़ में हैं।
इन चार विधानसभा हलकों में उपचुनाव इस कारण हो रहे हैं क्योंकि ये सीटें सांसद बनने के बाद खाली हो गई हैं। इससे पहले, जो विधायक चुने गए थे, उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके चलते ये चुनाव आवश्यक हो गए हैं। अब सभी पार्टी दल अपने-अपने प्रचार और रणनीतियों में जुट चुके हैं, ताकि वे अधिकतम संख्या में वोट प्राप्त कर सके। इन चुनावों में परिणाम निश्चित रूप से पंजाब की राजनीतिक धारा को प्रभावित करेंगे।