बरनाला में किसान बिजली टॉवर पर चढ़े: पुलिस हिरासत, जमीन कब्जा विरोध!

पंजाब के बरनाला जिले में किसानों के हितों की रक्षा को लेकर चल रहे संघर्ष ने एक नई दिशा ले ली है। जहाँ एक ओर किसान अपनी मांगों को लेकर अनशन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन ने किसान की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया है। भारत माला प्रोजेक्ट के तहत संधू कलां गांव में प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस बल ने बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन पर कब्जा करने के लिए कदम उठाया, जिसे किसानों ने मजबूती से विरोध किया। इस विरोध के दौरान कई किसान पुलिस के हाथों हिरासत में लिए गए, जिससे स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई।

प्रदर्शनकारी किसानों ने अपनी आवाज उठाने के लिए अति-खतरनाक पैतरा अपनाया, जिसमें चार किसान एक उच्च वोल्टेज बिजली टावर पर चढ़ गए। इस दौरान मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया, जो किसानों को टावर से नीचे लाने के प्रयास में जुटी है। इन किसानों का कहना है कि उन्हें अपनी जमीन और मकान के लिए उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है, जिसके कारण वे अपने घरों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

सतनाम सिंह, जो टावर पर चढ़े हुए किसानों में से एक हैं, ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उनकी जमीन से एक बड़ी सड़क गुजरने वाली है। उन्होंने प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्हें जमीन और मकान का जो मुआवजा दिया जा रहा है, वह नाकाफी है। सतनाम के अनुसार, 65 लाख रुपए मुआवजे की मांग की गई है, लेकिन प्रशासन ने केवल 60 लाख रुपए का प्रस्ताव रखा है, जबकि उनके घर की लागत एक करोड़ रुपए है। ऐसे में किसानों का कहना है कि वे अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।

किसानों का कहना है कि यदि उन्हें जबरदस्ती अपनी ज़मीन से बेदखल किया गया, तो वे अपनी जान देने में भी संकोच नहीं करेंगे। यही नहीं, किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस स्थिति के लिए पूरी तरह से प्रशासन और सरकार जिम्मेदार होंगे। ऐसा माना जा रहा है कि यदि प्रशासन और पुलिस आगे की कार्रवाई करते हैं, तो विरोध में किसान और अधिक सक्रिय हो सकते हैं और यह संघर्ष और भी बढ़ सकता है।

इस घटनाक्रम ने सरकार और प्रशासन की नीतियों पर सवाल उठाया है, खासकर जब वादे और मुआवजे का मुद्दा उठता है। किसानों की इस गंभीर स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं की जातीं, तब तक वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस मामले का निपटारा न केवल किसानों की भलाई का सवाल है, बल्कि प्रशासनिक नीतियों की पारदर्शिता और न्याय की परख का भी है।