अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : सेवाकेंद्र प्रभारी से लेकर मुखिया तक महिलाओं के हाथों में है कमान
-101 वर्षीय राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी हैं 50 हजार ब्रह्माकुमारी बहनों की नायिका
जयपुर, 7 मार्च (हि.स.)। नारी नरक का द्वार नहीं, बल्कि सिर का ताज है। नारी अबला नहीं, सबला है। वह शक्ति स्वरूपा है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और नारी के उत्थान के संकल्प के साथ समाज में महिलाओं को उनका खोया हुआ सम्मान दिलाने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं। इसी विचारधारा को सही अर्थों में चरितार्थ करने के लिए वर्ष 1937 में, उस समय के प्रसिद्ध हीरे-जवाहरात के व्यापारी दादा लेखराज कृपलानी ने नारी सशक्तिकरण की नींव रखी। महिलाओं के उत्थान को लेकर उनके दृढ़ संकल्प का प्रमाण यह है कि उन्होंने अपनी संपूर्ण संपत्ति को बेचकर एक ट्रस्ट की स्थापना की और उसके संचालन की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं को सौंप दी। परिवारवाद का संदेश न जाए, इस विचार के साथ उन्होंने अपनी बेटी तक को संचालन समिति में शामिल नहीं किया।
वर्ष 1950 में, इस संस्थान का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय माउंट आबू में स्थापित किया गया। यह एक छोटा सा प्रयास था, जो धीरे-धीरे भारत सहित विश्वभर में फैलता गया। प्रारंभ में, इस संगठन को ‘ओम मंडली’ के नाम से जाना जाता था, लेकिन 1950 में इसे ‘प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय’ के रूप में स्थापित किया गया। उस समय केवल 350 लोग इसके समर्पित सदस्य थे। आज, ब्रह्माकुमारी संस्थान नारी शक्ति द्वारा संचालित विश्व का सबसे बड़ा और एकमात्र संगठन है, जहां मुख्य प्रशासिका से लेकर प्रमुख पदों पर महिलाएं ही कार्यरत हैं। यह नारी सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है कि यहां भोजनालय में पुरुष भोजन बनाते हैं और महिलाएं बैठकर भोजन करती हैं। संगठन की सारी जिम्मेदारियों को बहनें संभालती हैं और भाई उनके सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं।
हाल ही में, एक कार्यक्रम में पहुंचीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस संगठन की सफलता और व्यापकता की सराहना करते हुए कहा था कि यह नारी शक्ति का प्रमाण है कि यदि महिलाओं को अवसर मिले, तो वे पुरुषों से बेहतर कार्य कर सकती हैं। राजयोग ध्यान का ही प्रभाव है कि संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका, स्वर्गीय दादी जानकी, जो केवल चौथी कक्षा तक शिक्षित थीं, 60 वर्ष की आयु में विदेशी धरती पर पहुंचीं और 90 वर्ष की उम्र तक अकेले 100 से अधिक देशों में भारतीय आध्यात्म और राजयोग मेडिटेशन का प्रचार किया। इसके अतिरिक्त, संस्थान की कई बहनें, जो केवल आठवीं कक्षा तक शिक्षित हैं, जब वे मंच पर ज्ञान और आत्मविश्वास से बोलती हैं, तो श्रोता उनकी विद्वता देखकर चकित रह जाते हैं।
संस्थान में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, प्रोफेसर, न्यायाधीश, आईएएस अधिकारी और गायक जैसे कई उच्च शिक्षित लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपने-अपने पेशे में सफलता पाने के बाद आध्यात्मिक मार्ग को अपनाया और अब संस्थान में समर्पित रूप से सेवा दे रहे हैं।
संस्थान से जुड़ना आसान हो सकता है, लेकिन ब्रह्माकुमारी बनने का मार्ग त्याग और तपस्या से होकर गुजरता है। पहले तीन साल तक, जब कोई कन्या किसी सेवाकेंद्र पर रहती है, तो उसके आचरण और नियम-संयम को परखा जाता है। इसके बाद, सात वर्षों तक संस्थान के ईश्वरीय संविधान का पूर्ण पालन करने के उपरांत ही ब्रह्माकुमारी के रूप में समर्पण किया जाता है। वर्तमान में, संस्थान के विश्वभर में 140 देशों में 5000 से अधिक सेवाकेंद्र संचालित हैं। 50 हजार से अधिक ब्रह्माकुमारी बहनें पूर्ण समर्पण के साथ अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसके अतिरिक्त, 20 लाख से अधिक लोग नियमित विद्यार्थी के रूप में सत्संग और मुरली क्लास में भाग लेते हैं, और दो लाख से अधिक युवा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए संस्थान से जुड़े हुए हैं।
ब्रह्माकुमारी संस्थान की शिक्षा का मुख्य आधार राजयोग है, जिसका मूल सिद्धांत ‘स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन’ है। सबसे पहले स्थानीय सेवाकेंद्रों पर सात दिनों का नि:शुल्क राजयोग मेडिटेशन कोर्स कराया जाता है, जिसमें आत्मा-परमात्मा का सत्य परिचय, सृष्टि चक्र, जीवन जीने की कला, कर्मों की गति, ध्यान की विधि और सकारात्मक विचारों को अपनाने की विधि सिखाई जाती है।
संस्थान केवल ज्ञान और ध्यान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नशामुक्ति, जैविक-यौगिक खेती, पर्यावरण संरक्षण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, युवा जागृति, महिला सशक्तिकरण और पौधारोपण जैसे कई बड़े अभियान भी चला रहा है। हाल ही में, ‘आजादी के अमृत महोत्सव से स्वर्णिम भारत की ओर’ अभियान के अंतर्गत, देशभर में 55 हजार से अधिक आध्यात्मिक जागृति और देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए।
संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) ने ब्रह्माकुमारी संस्थान को वर्ष 1981 और 1986 में शांति दूत पुरस्कार प्रदान किया। 1987 में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने इसे ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति संदेशवाहक’ के रूप में सम्मानित किया। मार्च 2019 में, तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अंतरराष्ट्रीय मोटिवेशनल स्पीकर बीके शिवानी को ‘नारी शक्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया।
संस्थान में समर्पित जीवन जीने के लिए सात दिनों के राजयोग कोर्स को पूरा करना आवश्यक होता है। इसके बाद, नियमित सत्संग और मुरली क्लास में भाग लिया जाता है। ब्रह्माकुमारी संस्थान की शिक्षा में योग का विशेष महत्व है। सभी भाई-बहनें ब्रह्ममुहूर्त में, प्रात: 4 बजे उठकर योगाभ्यास करते हैं। समर्पित सेवकों के लिए ज्ञान और योग के साथ-साथ सेवा भी एक महत्वपूर्ण अंग होती है। यहाँ जीवनशैली को सकारात्मक बनाने के लिए आत्मा की शुद्धता, गलत संस्कारों का त्याग और दिव्य गुणों की धारणा करना सिखाया जाता है।
संस्थान की प्रथम मुख्य प्रशासिका मातेश्वरी जगदम्बा सरस्वती थीं, जिन्हें सब ‘मम्मा’ के नाम से जानते थे। उनके निधन के बाद, राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि को मुख्य प्रशासिका नियुक्त किया गया, जिन्होंने 2007 तक यह जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद, राजयोगिनी दादी जानकी ने यह पद ग्रहण किया और 2020 में उनके अवसान के बाद दादी हृदयमोहिनी को मुख्य प्रशासिका बनाया गया। 2021 में दादी हृदयमोहिनी के निधन के बाद, दादी रतनमोहिनी को यह पद सौंपा गया।
ब्रह्माकुमारी संस्थान नारी सशक्तिकरण का अद्वितीय उदाहरण है, जिसने महिलाओं को नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन की मिसाल पेश की है।
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