नवाबों के शहर लखनऊ में पर्व और त्योहार हमेशा से तहजीब और संस्कृति के प्रतीक रहे हैं। इनमें से राजा टिकैत राय की होली खासतौर पर उल्लेखनीय मानी जाती है, जिसमें नवाबी ठाट-बाट के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता की गहरी झलक देखने को मिलती है। राजा टिकैत राय और नवाब आसिफ-उद-दौला के बीच की दोस्ती ने इस पर्व को और भी खास बना दिया। दोनों ने मिलकर होली को एक साझा उत्सव के रूप में आयोजित करने का प्रयास किया, जो लखनऊ की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। नवाब वाजिद अली शाह ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उनके समय में एक विशेष अवसर था, जब होली और मोहर्रम एक ही दिन आए। इस परिस्थिति में उन्होंने अद्वितीय निर्णय लिया कि पहले होली मनाई जाएगी और उसके बाद मोहर्रम का जुलूस निकाला जाएगा।
राजा टिकैत राय अवध के नवाब आसफ-उद-दौला के विश्वस्त मंत्री रहे और उन्होंने लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब को संजोए रखा। लखनऊ को 1775 में अपनी नई राजधानी बनाने के बाद, नवाब आसफ-उद-दौला ने स्थानीय विद्या, कला और संस्कृति के विकास को प्रोत्साहित किया। उनके साथ राजा टिकैत राय की दोस्ती ने न सिर्फ प्रशासनिक, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक एकता की मिसाल पेश की। राजा की होली में अब मुस्लिम समुदाय की भी बड़ी भागीदारी होती थी, जिससे यह पर्व एक सामूहिक उत्सव स्वरूप ले लिया।
होली के दिन राजा टिकैत राय की हवेली का माहौल अद्भुत होता था। सुबह से ही ढोल और मजीरे बजने लगते थे। रंगों और गुलाल से सजी यह हवेली एक सांस्कृतिक मेले में बदल जाती थी। उस समय नवाब भी अपने दरबारी और मित्रों के सहित राजा की होली का आनंद लेने के लिए आ जाते थे। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं था, बल्कि कवियों, शायरी और संगीतकारों का एक अद्भुत समागम भी होता था। उस दौरान की मशहूर शायरी करने वाले कवि जैसे मीर तकी मीर और जौक के द्वारा प्रस्तुतियां दी जाती थीं, जो होली की शाम को और भी खास बना देती थीं।
आज भी लखनऊ की गलियों में यह गंगा-जमुनी तहजीब जीवित है। नवाबीन-ए-अवध के वंशज नवाब मसूद अब्दुल्ला ने इसे स्वर्णिम युग का नाम दिया। चौक की गलियों में फाग गूंजने और गुलाल उड़ने पर लखनऊ एक बार फिर से उस नवाबी दरवाजे की स्मृतियों में खो जाता है। विनोद माहेश्वरी, जो कि होलिकोत्सव समिति के महामंत्री हैं, ने बताया कि आज भी मुस्लिम समुदाय उत्सव में पूरी सक्रियता से भाग लेता है और जगह-जगह स्वागत करता है।
हालांकि राजा टिकैत राय की हवेली की भव्यता समय के साथ कम हो गई है, लेकिन वहां की होली आज भी उसी उत्साह और परंपरा के साथ मनाई जाती है। रंगों का यह उत्सव न केवल आनंद का प्रतीक है, बल्कि इतिहास की भी गवाही देता है। इस साल रमजान के पाक महीने में होली आई है, इस प्रकार लखनऊ की गलियों में इबादत और रंगों का संगम देखने को मिल रहा है। यह नजारा इस शहर की मोहब्बत और तहज़ीब की जीवंत तस्वीर पेश करता है।
नवाब वाजिद अली शाह की परंपरा से जुड़ते हुए एक और दिलचस्प घटना सामने आई है, जिसमें उन्होंने अनूठे तरीके से होली और मोहर्रम का मेल किया। ये सभी घटनाएं लखनऊ की गंगा-जमुनी संस्कृति को और भी मजबूत बनाती हैं और यह साबित करती हैं कि यह शहर हमेशा से ही साथ मिलकर जश्न मनाने की मिसाल रहा है।