डॉ. डागा की याद में विचार मंथन: जीवनभर मानवीय मूल्यों के योद्धा!

महिलाओं की साहित्यिक संस्था ‘संभावना’ ने डॉ. मदन – सावित्री डागा की स्मृति में एक महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी का आयोजन किया। इस गोष्ठी का मुख्य विषय ‘साहित्य, संस्कृति और प्रतिरोध’ था। कार्यक्रम की मेज़बानी सावित्री-मदान डागा साहित्य भवन में की गई, जहां विख्यात आलोचक और विचारक राजाराम भादू मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे। इस आयोजन के अध्यक्षता सुप्रसिद्ध रंगमर्मज्ञ और कवि प्रो. अर्जुन देव चरण ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर दिनेश सिंघल भी मौजूद थे।

प्रो. अर्जुन देव चारण ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्य की गुणवत्ता और लेखक की जिम्मेदारी पर गहराई से विचार किया। उन्होंने कहा कि समाज को साहित्य से इस बात की अपेक्षा होती है कि लेखक जो भी कहता है, वह प्रमाणिक और सत्य हो। उन्होंने बताया कि साहित्य में आनंद की दृष्टि मिलती है और कवि ईश्वर के बनाए नियमों के अलावा अपनी सृजनात्मकता को प्रकट करता है। उनका मानना था कि कविता की संवेदनाएं मानवीयता के संग जुड़कर सहृदयता तक पहुँचती हैं। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि समय और स्थिति के अनुसार शब्दों का अर्थ बदलता है, और लेखक उसे नए तरीके से प्रस्तुत करता है।

मुख्य अतिथि राजाराम भादू ने साहित्य को संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि सभी कलाएं हमारी संस्कृति का निर्माण करती हैं। उन्होंने संस्कृति के दो पहलुओं पर चर्चा की – दृश्य और अदृश्य। दृश्य में हमारे बाहरी क्रियाकलाप शामिल हैं, जबकि अदृश्य में हमारे मूल्य, विश्वास और दृष्टिकोण। भादू ने ओ हेनरी और काफ्का की कहानियों का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे साहित्य में रचनाकार प्रतिरोध का सामना करता है।

विशिष्ट अतिथि दिनेश सिंघल ने मदन डागा की कविताओं को संदर्भित करते हुए कहा कि प्रतिरोध का हिस्सा तब तक होता है, जब तक कविता आपके निहितार्थ से जुड़ी होती है। उन्होंने बताया कि कविता केवल शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि यह हृदय की गहराई में घटित होने वाली अनुभूति होती है। डागा के व्यंग्य को उन्होंने प्रभावी बताया, जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देता है। उनकी कविताएं सामाजिक आंदोलनों में युवा वर्ग की आवाज बनी, जो आम आदमी के हक के लिए एक संघर्ष का प्रतीक है।

सावित्री डागा ने महिलाओं के मुद्दों को उजागर करने के लिए ‘संभावना’ संस्था की स्थापना की, जो पिछले आधी सदी से सक्रिय है। यह संस्था न केवल जोधपुर में, बल्कि पूरे प्रदेश में साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करती है। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सूरज माहेश्वरी ने किया, जबकि डॉ. मनीषा डागा ने उपस्थित सभी अतिथियों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम ने साहित्य और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया और प्रतिरोध की शक्ति को एक नई पहचान दी।