लखनऊ में ज्येष्ठ महीने के सभी मंगलवार को “बड़ा मंगल” के रूप में मनाने की परंपरा रही है। इस दिन पूरे शहर में भंडारों का आयोजन किया जाता है, जो कि 400 साल पुरानी इस परंपरा का हिस्सा हैं। इस मौके पर हिंदू धर्म के अनुयाइयों के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोग भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इस साल ज्येष्ठ महीने में कुल 5 बड़े मंगल पड़ रहे हैं, जिसमें लखनऊ के लगभग 25 प्रतिशत लोगों के शामिल होने का अनुमान है। आइए जानते हैं ‘बड़ा मंगल’ की शुरुआत से जुड़ी कुछ मान्यताओं के बारे में।
पहली मान्यता के अनुसार, अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला की बेगम, मल्लिका आलिया, को एक रात ख्वाब में एक दिव्य मूर्ति के दर्शन हुए। उन्होंने इस विषय में पंडितों और मौलवियों से सलाह ली, जिसके बाद तय हुआ कि फैजाबाद से एक हाथी लाया जाएगा। हाथी को दूध से स्नान कराकर पूजा के बाद लाया गया। लेकिन हाथी जब लखनऊ में गोमती नदी के पास रुका, तो दूसरे हाथी ने भी उसी जगह पर रुक जाने का निर्णय लिया। इसके बाद तीसरा हाथी भी उसी स्थान पर रुका, जिसे सभी ने जादुई मान लिया। खुदाई करने पर हनुमानजी की मूर्ति मिली, जिसके बाद बेगम ने वहां एक मंदिर बनाने का निर्णय लिया। यह लगभग 1760 का समय था, और तब से इस स्थान पर ‘अलीगंज हनुमान मंदिर’ की स्थापना हुई थी।
दूसरी मान्यता बताती है कि बेगम का एक बेटा गंभीर बीमार पड़ा था। जब सभी उपाय नाकाम रहे, तो उन्होंने हनुमानजी से मन्नत मांगी। उनके बेटे की तबीयत ठीक हो गई, जिसके बाद बेगम ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। कहते हैं कि नवाब बजरंगबली की मूर्ति को इमामबाड़े के पास ले जाना चाहते थे, लेकिन हाथी गोमती के किनारे पर रुक गया, जिसके बाद वहीं नया हनुमान मंदिर स्थापित किया गया। इसके साथ ही बड़े मंगल पर भंडारे की शुरुआत भी हुई।
तीसरी मान्यता के अनुसार, लखनऊ में एक बार महामारी फैल गई थी। लोग हनुमानजी से प्रार्थना करने लगे और जब महामारी खत्म हुई, तब उन्होंने हनुमानजी का प्रसाद वितरित करने का निर्णय लिया। इस प्रथा के तहत आज भी हर साल ज्येष्ठ महीने के मंगलवार को भंडारे का आयोजन किया जाता है।
पुरातन लेटे हनुमानजी के मुख्य पुरोहित डॉ. विवेक तांगड़ी का कहना है कि यह परंपरा नवाबों के समय से चली आ रही है। वे लोग रात के करीब 1 बजे घरों से निकलते थे, नंगे पांव चलते हुए हनुमानजी के दर्शन करने के लिए जाते थे। यह पवित्रता और आस्था का प्रतीक है। हनुमानजी हमेशा संकट मोचक रहे हैं और उनका पुण्य कार्य, भूखे को भोजन और प्यासे को पानी देना, आज भी जीवित है।
लखनऊ में बड़े मंगल का ये आयोजन अब पूरे उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है। लखनऊ की ऐतिहासिकता और यहाँ के धर्म का ऐसा संगम, इस शहर की गंगा-जमुनी संस्कृति को दर्शाता है। जैसे कि दिवंगत इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीन ने अपने ग्रंथ “लखनऊ नामा” में लिखा है, लखनऊ में हनुमानजी के प्राचीन मंदिरों का भी उल्लेख है, जो इस समृद्ध परंपरा की गवाही देते हैं।