(क्रांतिकारी बैकुण्ठ शुक्ल का बलिदान दिवस/14 मई, 1934) विश्वासघाती फणीन्द्र घोष को मौत के घाट उतारा
रमेश शर्मा
कहने के लिए भारत विदेशी आक्रांताओं से पराजित हुआ, किन्तु भारत का इतिहास तो घर के उन विश्वासघातियों ने लिखा जो मुखबिर बने। अंग्रेजों का एक ऐसा ही मुखबिर फणीन्द्र घोष बना, जिसके कारण क्रांतिकारी आँदोलन में बिखराव आया । सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी बैकुण्ठ लाल शुक्ल ने सबकाम छोड़कर विश्वासघायी फणीन्द्र को मौत के घाट उतारा था । ऐसे ओजस्वी क्रांतिकारी बैकुण्ठ लाल शुक्ल का जन्म 15 मई 1907 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत ग्राम जलालपुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक अपने गांव में ही हुई और मुजफ्फरपुर से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की । उनका परिवार भी राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदानियों का रहा है ।
पितामह 1857 की क्रान्ति में सक्रिय हुए तो चाचा योगेन्द्र शुक्ल बिहार में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएसन का नेतृत्व कर रहे थे। स्वत्व के लिए ऐसे संघर्षशील परिवार में जन्मे बैकुण्ठ लाल जी का बालवय से झुकाव स्वतंत्रता संघर्ष की ओर हुआ । किशोर वय से ही वे क्रांतिकारियों के सहयोगी बन गए थे । समय के साथ विवाह हुआ और परिवार की आवश्यकता के लिए शिक्षक की नौकरी शुरु कर दी । नौकरी के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते थे । इसलिए अहिसंक आंदोलन की ओर मुड़ गए । इसके अलावा उन्हें लगता था कि क्रांतिकारी आंदोलन से पहले जन जागरण जरूरी है । इसलिए यह नवविवाहित जोड़ा स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गया और 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी भाग लिया । गिरफ्तार हुए । यहीं से बैकुंठ शुक्ला की जेल यात्राएं आरम्भ हुई। गांधी-इरविन समझौते के बाद उन्हें अन्य सत्याग्रहियों के साथ रिहा किया गया।
रिहाई के बाद 1931 में मुजफ्फरपुर के तिलक मैदान में पत्नी राधिका सहित पहुंचे और झंडा फहरा दिया। किसी प्रकार राधिका देवी तो बच निकलीं पर बैकुण्ठ लाल शुक्ल बंदी बना लिए गए। राधिका देवी ने अपने पति तथा गिरफ्तार अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रिहाई के लिए सत्याग्रह किया और, अंततः वे भी गिरफ्तार कर लीं गईं । यद्यपि बैकुण्ठ लाल शुक्ल अहिसंक आंदोलन से जुड़ गए थे लेकिन उनका सद्भाव क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति बना रहा । इसी बीच क्रांतिकारी आंदोलन सेंट्रल एसेम्बली बम कांड का सनसनीखेज समाचार आया । इसमें में सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 1931 में फांसी का समचार भी आया । यह समाचार भी छुप न सका कि इस असेंबली बम कांड में बेतिया निवासी फणीन्द्र नाथ घोष टूट गए और पुलिस के मुखबिर बन गए । अदालत ने उनके बयान महत्वपूर्ण माने। चूंकि फणीन्द्रनाथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य और क्रांतिकारियों के सहयोगी रहे थे । यह बात सभी को चुभी । फणीन्द्र बिहार के रहने वाले थे । बैकुंण्ठ शुक्ल भी बिहार से थे । इसलिए हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने बैकुण्ठ शुक्ल से संपर्क किया ।
1932 के अंत में फणीन्द्रनाथ घोष की हत्या का निर्णय हुआ और यह काम बैकुंठ शुक्ला और चंद्रमा सिंह को सौंपा गया। दोनों उन दिनों बिहार के बेतिया में थे। बैकुण्ठ लाल शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साइकिल से बेतिया पहुंचे । घर पहुंचे तो फणीन्द्र बाहर अपने दोस्त गणेश प्रसाद गुप्त से बात कर रहा था । गणेश प्रसाद गुप्त भी पहले हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ दूर हो गया था । दोनों क्रांतिकारियों ने बिना कोई विलंब किए दोनों को गोली मारी और साइकिल वहीं छोड़कर भाग निकले। यह 17 नवंबर 1932 का दिन था । फणीन्द्र नाथ घोष की मौत उसी दिन हुई जबकि गणेश प्रसाद की मौत तीन दिन बाद 20 नवंबर को हुई ।
इस दोहरे हत्याकांड से पूरी सरकार सकते में आ गई। विशेषकर फणीन्द्र की मौत से वे चौंक गए । फणीन्द्र उनका महत्वपूर्ण मुखबिर था, जिसकी सूचनाओं से ही ब्रिटिश सरकार को क्रांतिकारी आंदोलन का दमन करने के रास्ते मिले । अंग्रेज सरकार ने दोनों की गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा की । अंग्रेजों को फिर कोई विश्वासघाती मिला जिसकी सूचना पर चन्द्रमा सिंह की गिरफ्तारी 5 जनवरी 1933 को कानपुर से और बैकुण्ठ लाल शुक्ल की गिरफ्तारी 6 जुलाई 1933 को सोनपुर के गंडक पुल पर हुई । मुजफ्फरपुर की जिला अदालत में दोनों पर हत्या का मुकदमा चला। बैकुण्ठ लाल शुक्ल ने चंद्रमा सिंह को बचाते हुए हत्या की सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली। 23 फरवरी 1934 को सत्र न्यायाधीश ने बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सजा सुनाई और चंद्रमा सिंह को दोष मुक्त कर दिया ।
बैकुंठ शुक्ल ने सत्र न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय में अपील की । 18 अप्रैल 1934 को अपील खारिज हुई और हाई कोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी । 14 मई 1934 को गया जेल में बैकुण्ठ शुक्ल को फांसी दे दी गई। बिहार राज्य सरकार ने बैकुण्ठ शुक्ल की प्रतिमा मुजफ्फरपुर में लगाई है। प्रति वर्ष इस स्थल पर श्रृद्धांजलि सभा होती है ।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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