मशरूम की खेती से आत्मनिर्भर बनीं बोबी, ग्रामोत्थान परियोजना बनी संबल

मशरूम की खेती से आत्मनिर्भर बनीं बोबी, ग्रामोत्थान परियोजना बनी संबल

हरिद्वार, 19 मई (हि.स.)। जनपद के बहादराबाद ब्लॉक के छोटे से गाँव रावली महदूद की बोबी की कहानी आज ग्रामीण सशक्तिकरण की मिसाल बन गई है। कभी सीमित संसाधनों के साथ सूक्ष्म स्तर पर मशरूम की खेती करने वाली बोबी आज ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना की सहायता से आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में, ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना की ब्लॉक स्तरीय टीम ने बोबी की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन किया। टीम के मार्गदर्शन में, बोबी ने मशरूम की खेती को बड़े स्तर पर करने का निर्णय लिया, जो उस समय उनके लिए आय का एक नया और अप्रयुक्त स्रोत था। परियोजना ने बोबी को कुल 25 हजार की अनुदान राशि प्रदान की, जबकि बोबी ने स्वयं के बचत से 20 हजार का योगदान दिया और 55 हजार का बैंक ऋण भी प्राप्त किया। कुल मिलाकर एक लाख की लागत से यह उद्यम शुरू किया।

इस सहायता से बोबी ने बड़े पैमाने पर मशरूम की खेती शुरू की, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पहले सूक्ष्म स्तर पर मशरूम की खेती से उन्हें मासिक आय लगभग 5 हजार थी, लेकिन अब वे मशरूम की खेती से प्रति माह लगभग 18,750 से भी अधिक की आय अर्जित कर रही हैं। यह उनके और उनके परिवार के लिए एक बड़ा बदलाव है, जिससे उन्हें अपने परिवार का पालन-पोषण बेहतर ढंग से करने में मदद मिल रही है।

बोबी, जो श्रद्धा सीएलएफ के मिलाप ग्राम संगठन के श्याम स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं, ये अपने समूह की सक्रिय सदस्य भी हैं, जो अब अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन गई हैं। उनकी सफलता की कहानी यह दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता और व्यक्तिगत दृढ़ संकल्प के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी कैसे बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना का उद्देश्य ग्रामीण लोगों को सशक्त बनाना और उनकी आजीविका में सुधार लाना है, और बोबी जैसी महिलाओं की सफलता इस मिशन का प्रमाण है। बोबी की मशरूम क्रांति सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि उम्मीद और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गई है।

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