जंगलराज से बिहार का बचाव

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

यह सही है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सहित भाजपा के अनेक नेताओं ने नीतीश कुमार के लिए पार्टी के दरवाजे बंद रखने का ऐलान किया था। यह नीतीश के परिवारवाद और घोटाले के आरोपों से घिरी राजद के पाले में जाने के बाद लिया गया था। लेकिन आज उसी बिहार को परिवारवाद, भ्रष्टाचार घोटालों से बचाने के लिए भाजपा को निर्णय बदलना पड़ा। यह निर्णय उस विचार के अनुरूप है कि राष्ट्र और जनहित पहले, पार्टी बाद में। बिहार का हित इसी में था। भाजपा ने भारत रत्न से विभूषित कर्पूरी ठाकुर के विचारों पर अमल किया। बिहार को परिवारवाद के वर्चस्व की तरफ बढ़ने से रोक दिया। कर्पूरी ठाकुर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के घोर विरोधी थे। वह जिस झोपड़ी में जन्मे थे, वही जीवन के अंत तक उनकी संपत्ति थी। जबकि वह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री, एक बार उप मुख्यमंत्री, एक बार सांसद बने। दशकों तक विधायक रहे। वह उस समय जनसंघ के सहयोग से ही मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री बने थे। आज नरेन्द्र मोदी सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान दिया है। उनके विचारों को भी सम्मान दिया है। बिहार को राजद के परिवारवाद और भ्रष्टाचार को बचाने का कार्य किया है।

राजद प्रमुख अपने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नीतीश पर निर्णायक दबाब बना चुके थे। जातिगत जनगणना के बाद से लालू यादव का नीतीश पर मुख्यमंत्री पद छोड़ने का दबाब ज्यादा बढ़ गया था, क्योंकि जातिगत जनगणना से उनका एमवाई समीकरण मजबूत दिखाई दे रहा था। दूसरी तरफ नीतीश कमजोर दिखाई देने लगे थे। नीतीश कुमार को आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए। भाजपा के साथ केंद्र में मैत्रीपूर्ण फिर मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी सुशासन बाबू की छवि बनी थी। वह छवि राजद से हाथ मिलाते ही चौपट हो गई। नीतीश को अपनी धूमिल हो चुकी छवि को संवारने का एक और अवसर मिला है।

बिहार की राजनीति में भाजपा और राजद दो विपरीत ध्रुव हैं। भाजपा राष्ट्रवादी विचारधारा और कैडर आधारित पार्टी है। दूसरी तरफ राजद परिवार आधारित पार्टी है। इसके संस्थापक मुख्यमंत्री रहते हुए ही घोटालों के सरताज बने। उस समय उनके पुत्र छोटे थे। इसलिए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। लालू यादव आज भी वहीं है। अब उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। छोटे पुत्र तेजस्वी बड़े हो गए। नीतीश कुमार को वही डील कर रहे थे। कहने को तेजस्वी उपमुख्यमंत्री थे। लेकिन नीतीश के मुकाबले लगभग दो गुना संख्याबल था। ऐसी सरकारें खास अंदाज में चलती हैं। मुख्यमंत्री को अपने उप मुख्यमंत्री की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता था। भाजपा और जेडीयू की बात अलग थी। दोनों ने मिलकर चुनाव था। गठबंधन के नेता नीतीश कुमार थे। उन्हीं को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इसी गठबंधन को जनादेश मिला था। इसमें भी जेडीयू का संख्याबल भाजपा से कम था। लेकिन भाजपा ने जनादेश का सम्मान किया। नीतीश के नेतृत्व में सरकार को जन आकांक्षा के अनुरूप चलाया जा रहा था।

राजद का पूरा कुनबा ही घोटालों के आरोप में घिरा है। नीतीश ने जब पहली बार पाला बदल कर राजद के साथ सरकार बनाई थी, तब भी राजद ने अपनी मूल प्रकृति का परित्याग नहीं किया। उस सरकार में तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री थे। उनके बड़े भाई स्वास्थ्य मंत्री थे। दोनों मिल कर लालू यादव की विरासत को बढ़ाने जुटे थे। सुशासन बाबू यह देख कर बेचैन हो गए थे। उन्हें लगा भाजपा के साथ रहकर जो छवि निर्मित हुई थी, सब तार-तार हुई जा रही है। इसलिए नीतीश कुमार उस गठबंधन से पीछा छुड़ाकर भाजपा में वापस आ गए थे। नीतीश और लालू परिवार के बीच फिर अमर्यादित आरोपों की बौछार शुरू हो गई थी।

ऐसा लगा जैसे नीतीश अब कभी लालू के कुनबे की तरफ पलट कर नहीं देखेंगे। लेकिन फिर बेतलवा डाल पर की कहावत चरितार्थ हुई थी। फिर हमप्याला हो गए। मगर इस बार राजद ने अपरोक्ष रूप में नीतीश कुमार को औकात बता दी और यह संदेश दिया कि उन्हें राजद के हिसाब से ही सरकार चलानी होगी। नीतीश ने भी इस संदेश को शिरोधार्य कर लिया। नीतीश को शुरुआत में ही बता दिया गया राजद कोटे के मंत्रियों पर लगे आरोपों पर वह मौन रहेंगे। सरकार में बिहार में नए कानून मंत्री कार्तिकेय सिंह को लेकर विवाद शुरू हो गया था। इस पर नीतीश कुमार पूरी तरह लाचार दिखाई दिए। तब नीतीश ने कहा कि विवादित या आरोपी मंत्रियों पर उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव निर्णय लेंगे।

बार-बार पाला बदलने के बाद नीतीश कुमार में इतना भी नैतिक साहस नहीं बचा था। उन्होंने मान लिया था कि राजद कोटे के सभी मंत्रियों के लिए तेजस्वी ही अघोषित मुख्यमंत्री हैं। नीतीश केवल अपनी कुर्सी और अपनी पार्टी के मंत्रियों के क्रियाकलाप देखेंगे। इसलिए नीतीश कुमार ने कहा कि कानून मंत्री कार्तिकेय सिंह पर लगे आरोपों के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं थी। जबकि उनके खिलाफ अपहरण के एक मामले पर कोर्ट ने वारंट जारी किया था। यह अकेला मामला नहीं था। नीतीश सरकार में आधा दर्जन से ज्यादा क्रिमिनल और हिस्ट्रीशीटर शामिल थे। राजद की समस्या यह थी कि वह अच्छी छवि वाले विधायक लाए भी कहां से। इस पार्टी में ऐसे लोगों का ही वर्चस्व है। राजग में शामिल होना नीतीश कुमार के लिए प्रायश्चित की तरह है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)