लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की न्याय व्यवस्था व शासन से हमें लेनी चाहिए सीख

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की न्याय व्यवस्था व शासन से हमें लेनी चाहिए सीख

-हरिश्चंद्र श्रीवास्तव

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर का मतलब कठिन संघर्ष, धैर्यशीलता, संयम, धर्मपरायणता, वीरता , बुद्धिमत्ता, प्रशासन, कुशलता ,ओजस्विता, प्रजा वत्सलता, न्याय प्रियता, कुशल नेतृत्व की अद्भुत क्षमता से परिपूर्ण। साथ ही दानशीलता, त्याग, तपस्या, अत्यंत सहजता सरलता के साथ सिद्धांतों के लिए अत्यंत कठोरता और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण। इन सब गुणों को मूर्तमान किया जाय तो वह थीं होलकर साम्राज्य की बहू जिन्हे आदर के साथ भारतीय जनमानस लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर। उन्होंने जहां शासन करते समय किसी के सामने घुटने नहीं टेके, वहीं मुगलों द्वारा क्षतिग्रस्त किए गए देश भर के सभी धार्मिर्क स्थलों का पुनर्निमाण कराकर भारतीय सनातन संस्कृति की रक्षा की। आज जब सार्वजनिक जीवन, प्रशासन, न्याय व्यवस्था से लेकर धर्म भी व्यापार बनता जा रहा है तो राष्ट्र हित लोकहित व जनहित में यह नितांत आवश्यक है कि राजनेता व प्रसशानिक अफसरों समेत सभी को लोकमता देवी अहिल्याबाई होलकर के जीवन से कुछ सीख लेनी चाहिए।

31मई को लोकमाता महारानी अहिल्याबाई होलकर के धरती पर अवतरण हुए 300 वर्ष पूरे हो रहे हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट बीड़ तहसील के चौड़ी गांव के माणकोजी की धर्मपत्नी सुशीलबाई ने 31 मई 1725 को जिस सुकन्या को जन्म दिया, उसके पूज्यनीय वंदनीय धर्मपरायण प्रजावत्सल अत्यंत तेजस्वी ओजस्वी प्रेरक व्यक्तित्व को जनमानस देवी माँ अहिल्याबाई के रूप में भारतीय मनीषा के स्मृति पटल पर देदीप्यमान है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई इतिहास के पन्नो को अमिट स्वर्णाक्षर तो हैं ही साथ ही भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए कार्य के लिए भारत की सनातन संस्कृति और यहां की धर्म परायण जनता जनार्दन सदैव ऋणी रहेगी ।

धर्मपरायण माता पिता के संस्कार महारानी अहिल्याबाई होलकर के जीवन का आधार बना। उनको लोकमाता देवी अहिल्याबाई का नाम भारत की धर्मपरायण जनता के मन में उनके कृतित्व व व्यक्तित्व के सम्मान और उनके प्रति असीम श्रद्धा व प्रेम की भाव अभिव्यक्ति है। समूचे भारतीय इतिहास में पौराणिक कथाओं में वर्णित महापुरुषों से लेकर वर्तमान के कालखंड तक उन्हें ही पूज्यनीय, वंदनीय व प्रेरक माना जाता है, जिन्होंने लोककल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारतीय संस्कृति व राष्ट्र ने उन्ही का यशोगान किया, जिसने देश समाज व लोकहित में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया ।

लोकमाता देवी महारानी अहिल्या बाई होलकर का पूरा जीवन संघर्ष और त्याग का दस्तावेज है। सन 1733 में मल्हार राव होलकर के बेटे खंडेकर राव होलकर के साथ शादी होने के बाद से ही उन्हें अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। वह अपने पति खंडेराव होलकर के साथ कुछ समय ही वैवाहिक जीवन जी पाई थीं। तभी सन 1754 में भरतपुर के डींग में हुए युद्ध के दौरान खंडेराव होलकर वीरगति को प्राप्त हो गए। इससे अहिल्याबाई काफी हिल गईं।उन्होंने उस समय की प्रथा के मुताबिक पति की चिता पर सती होन का फैसला कर लिया था। लेकिन श्वसुर महाराजा मल्हार राव होलकर के काफी समझाने के कारण सती होने के निर्णय को त्याग दिया। सन 1761 में पानीपत के युद्ध में मराठों की हार और मई 1766 को आलमपुर में श्वसुर की मृत्यु के बाद होलकर साम्राज्य को सम्हालने के लिए पुत्र मालेराव का 23 अगस्त 1766 में राजतिलक किया गया। लेकिन 23 वर्ष की अल्प आयु में इकलौते पुत्र का निधन हो गया। इसके बाद दामाद यशवंतराव फड़से भी हैजे के प्रकोप के चलते तीन नवम्बर 1791 दिवगंत हो गए। बेटी मुक्ताबाई पति की चिता पर ही सती हो गईं। इस तरह महारानी अहिल्याबाई होलकर पर एक के बाद एक दुखों के पहाड़ टूटटे रहे। लेकिन इन हृदयविदारक घटनाओं में जिस धैर्य विवेक और साहस के साथ लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने कर्तव्य निभाया और प्रजापालन किया, वह अपने आप में महान से भी महान कार्य रहा।

होलकर परिवार की विशेषता रही की व्यक्तिगत खर्चे के लिए कभी भी राज्य कोष से धन नहीं लेते थे। देशभर के तीर्थ स्थलों बद्री नारायण ,केदारनाथ धाम से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम पूर्व में जगन्नाथ पुरी से लेकर पश्चिम में द्वारका सोमनाथ मंदिर समेत ऐसा कोई तीर्थस्थल नहीं रहा, जंहा देवी अहिल्याबाई द्वारा निर्मित वास्तुशिल्प दिखाई न देता हो। यही नहीं मंदिर और घाटों व तीर्थ यात्रियों की सुविधा के अनुसार पीने के लिए पानी और ठहरने के लिए धर्मशालाओं का निर्माण कराया। साथ ही उनके कुशल संचालन के लिए सुयोग्य व्यक्तियों की नियुक्तियां कीं। धार्मिक स्थलों की आर्थिक प्रतिपूर्ति के लिए व्यवस्था का निर्माण करने का कार्य किया जो भारतीय संस्कृति के उन्नयन और विकास के लिए देवी अहिल्याबाई का अप्रतिम योगदान है। महारानी अहिल्याबाई होलकर परम शिव भक्त थीं। उन्होंने अधिकाधिक संख्या में शिव मंदिरों का निर्माण कराया।

सन 1667 में औरंगज़ेब द्वारा काशीविश्वनाथ मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था। महारानी अहिल्याबाई होलकर ने 1785 में भगवान काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनः निर्माण कराया। यही नहीं सप्तपुरियों व बारह ज्योतिर्लिंगों, चारों धाम समेत सभी जगह उन्होंने यात्रियों स्नान, ध्यान, पूजा-अर्चन, निवास व भोजन की समुचित व्यवस्था की। उन्होंने काशी से कलकत्ता तक सड़क का निर्माण कराया। 1818 में सर माल्कम ने मेमायर्स ऑफ़ सेंट्रल इंडिया में लिखा की उसका सहायक कैप्टेन डीटी स्टुअर्ट केदारनाथ और देवप्रयाग जैसे दुर्गम तीर्थ स्थानों पर गया था। उसने बताया कि वहां पर देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित धर्मशाला, कुंड तथा उनके द्वारा निर्मित सिद्धनाथ मंदिर मध्यभारत की सर्वश्रेष्ठ मंदिर शिल्प है।

देवी अहिल्याबाई द्वारा नर्मदा के किनारे महेश्वर में बनाई गई राजधानी और उनका अत्यंत साधारण आवास देखने सभी को जाना चाहिए। खासकर राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं, प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों व न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को भी, जिससे वह समझ सकें कि जिस महनीय व्यक्तित्व ने अरबों-खरबों भारतीय संस्कृति के उन्नयन में आम जन के लिए खर्च किया, उनकी जीवनशैली, रहन-सहन के साथ ही उनकी राज्य व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्थित नेतृत्व व न्याय व्यस्था से कुछ सीख ले सकें। लोकमाता देवी अहिल्या बाई की जन्म त्रिशताब्दी मनाना तभी सार्थक होगा जब हम उनके जीवन से कुछ सीख ले सकें। उनके शासन-प्रशासन, न्याय, नेतृत्व इन व्यापक पहुलुओं को किंचित मात्र आत्मसात कर सकें। आज जब सार्वजनिक जीवन , प्रशासन, न्याय व्यवस्था से लेकर धर्म भी व्यापार बनता जा रहा है तो राष्ट्र हित लोकहित व जनहित में यह नितांत आवश्यक है कि हमें लोकमता देवी अहिल्याबाई होलकर के जीवन से कुछ सीख लेनी चाहिए।

(लेखक सामाजिक व राजनीतिक चिंतक हैं)

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