उन्होंने कहा कि डायन कोई नहीं होती, यह केवल अर्धविकसित समाज की मानसिक बीमारी है। ओझा-गुनी के भ्रम में पड़कर लोग न केवल आर्थिक नुकसान उठाते हैं, बल्कि अपराध को भी जन्म देते हैं। झाड़फूंक और तंत्र-मंत्र से किसी की जान नहीं ली जा सकती, यह सब झूठ और भय का खेल है।
बलि प्रथा को भी उन्होंने अमानवीय बताते हुए कहा कि कोई भी देवी-देवता अपने ही बनाए जीवों की बलि नहीं मांग सकते। समाज को अब वैज्ञानिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक शिक्षा की जरूरत है ताकि लोग अपने अंदर की शक्ति को पहचानें और अंधविश्वास से बाहर निकलें।