उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु केवल एक नाम नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा थे। उनका व्यक्तित्व राजनीति की सीमाओं से कहीं बड़ा था। मैंने उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक पथ-प्रदर्शक, एक मार्गदर्शक और झारखंडी स्वाभिमान की जीती-जागती मूर्ति के रूप में अनुभव किया है।