क्रिकेट के बहाने भारत को आंख दिखाता बांग्लादेश

यह बात आज खेल से जुड़ी घटना भर नहीं रह गई है। इसके पीछे छिपी राजनीति, वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय साजिशें इसे कहीं अधिक गंभीर बना देती हैं। जिस बांग्लादेश का जन्म भारत के सहयोग, बलिदान और निर्णायक भूमिका के कारण संभव हुआ, वही देश आज भारत को चुनौती देने की स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। यह बदलाव अचानक नहीं है, कहना होगा कि इसके पीछे वर्षों से पनपती कट्टरपंथी सोच, पाकिस्तान की शह पर चलने वाली राजनीति और भारत की ढीली कूटनीतिक रणनीति की स्पष्ट झलक मिलती है।

आप देख सकते हैं कि बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद यूनुस सरकार के आने के साथ ही हालात तेजी से बदले। इस बदलाव का सबसे भयावह रूप वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को झेलना पड़ रहा है। लगातार हो रही हत्याएं, मंदिरों पर हमले, पलायन की विवशता और हिंसा का खुला दौर यह बताता है कि अब कट्टरपंथ केवल सामाजिक स्तर तक सीमित न होकर उसे सत्ता का मौन समर्थन भी प्राप्त है। हालांकि ऐसा नहीं है कि शेख हसीना की सरकार में अल्‍पसंख्‍यक हिन्‍दुओं पर दमन कम हो रहा था, किंतु आज जिहादी यहां सबसे अधि‍क सक्रिय हैं। इसी जिहादी और कट्टरपंथी माहौल में भारत विरोध को एक स्थायी एजेंडा बना लिया गया है। भारत को खुले तौर पर अपना दुश्मन मानने की मानसिकता इसी विचारधारा की देन है।

देखा जाए तो आज यह स्थिति इसलिए भी अधिक पीड़ादायक लगती है क्योंकि बांग्लादेश का अस्तित्व भारत के बिना संभव नहीं था। 1971 में भारत ने अपने सैनिकों का बलिदान देकर बांग्लादेश को एक देश के रूप में पाकिस्‍तान के चंगुल से मुक्‍त कराया। इसके लिए भारत ने तात्‍कालीन समय में लाखों शरणार्थियों का बोझ उठाया, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का विरोध सहा और अंततः बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इसके बावजूद आज वही बांग्लादेश भारत को आंख दिखा रहा है। तटस्‍थ भाव से देखें तो यह कहीं न कहीं भारत की बांग्लादेश नीति पर भी सवाल खड़े करता है। सच; बांग्‍लादेश के संदर्भ में प्रतीत यही होता है कि यदि नीतियां संतुलित, होने के साथ सख्त और दूरदर्शी रही होतीं, तब शायद आज जैसी स्थिति पैदा ही नहीं होती।

ताजा विवाद क्रिकेट से जुड़ा है, किंतु इसके मायने खेल से कहीं आगे राजन‍ीतिक एवं कूटनीति‍क स्‍तर तक जाते हैं। अगले महीने भारत और श्रीलंका की संयुक्त मेजबानी में टी20 वर्ल्ड कप आयोजित होना है। तय कार्यक्रम के अनुसार बांग्लादेश को अपने चार मुकाबले भारत में खेलने थे, जिनमें से तीन कोलकाता और एक मुंबई में होना था। किंतु इस्‍लामिक कट्टरपंथी यूनुस सरकार के प्रभाव में काम कर रहे बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भारत आने से इनकार कर दिया है।

बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने भारत में होने वाले टी20 वर्ल्ड कप 2026 का बहिष्कार करने का ऐलान किया है। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के प्रेसिडेंट अमीनुल इस्लाम बुलबुल ने कहा- “हम ICC के साथ बातचीत जारी रखेंगे। हम वर्ल्ड कप खेलना चाहते हैं, लेकिन हम भारत में नहीं खेलेंगे। हम लड़ते रहेंगे।” ये भारत के साथ लड़ते रहने की सोच अपने आप भी बहुत कुछ कहती है, हालांकि कहने को इसके लिए सुरक्षा का बहाना बनाया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत दुनिया के सबसे सुरक्षित क्रिकेट आयोजक देशों में से एक है।

इस पर आईसीसी ने साफ कहा कि भारत में सुरक्षा को लेकर कोई समस्या नहीं है और टूर्नामेंट शुरू होने में अब इतना समय नहीं बचा है कि स्थान बदला जा सके। इसके बावजूद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड अपनी जिद पर अड़ा हुआ है। इससे यह साफ हो गया कि मामला सुरक्षा से कहीं अधिक राजनीति से जुड़ा हुआ है। आज ये क्रिकेट को हथियार बनाकर भारत पर दबाव बनाने की नाकाम कोशिश की जा रही है। ताकि भारत आगे बांग्‍लादेश में हो रहे हिन्‍दू अल्‍पसंख्‍यक अत्‍याचार पर चुप रहे।

दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम और संदिग्ध नजर आती है। बांग्लादेश आज जिस तरह भारत विरोधी रुख अपना रहा है, उसके पीछे पाकिस्तान का उकसावा साफ दिखता है। कहना यही होगा कि कुल मिलाकर यह पूरा मामला राजनीति और कट्टर सोच का नतीजा है, जिसमें खेल को सिर्फ एक माध्यम बनाया गया है। बांग्लादेश का यह रवैया दर्शाता है कि वहां की सरकार और संस्थाएं तर्क, सत्ता पक्ष एवं वास्‍तविकताओं के आधार पर नहीं वह भावनात्मक और वैचारिक कट्टरता से संचालित हो रही हैं। इस्‍लाम के नाम पर आज पाकिस्तान के साथ खड़े होकर भारत विरोध करना उन्हें शायद तात्कालिक संतोष दे, किंतु इतना तय है कि लंबे समय में यह उनके ही हितों के खिलाफ जाएगा।

भारत के लिए यह समय आत्ममंथन का है। बार बार दोस्ती का हाथ बढ़ाने, सहायता देने और उदारता दिखाने के बावजूद यदि जवाब शत्रुता में मिलती है, तब उस स्‍थ‍िति में उसे अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए और बांग्‍लादेश के साथ संबंधों पर नीति में बदलाव जरूरी हो जाता है। यह सच है कि पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध महत्वपूर्ण हैं, किंतु इसका अर्थ कतई ये नहीं कि यह संबंध आत्मसम्मान, राष्‍ट्रीय सुरक्षा और देश हित की कीमत पर आगे बढ़ाए जाते रहें। बांग्लादेश के संदर्भ में भारत को अब भावनाओं से काम नहीं लेना चाहिए, उसे आज स्पष्ट और मजबूत नीति के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

अंत में यही कि क्रिकेट के बहाने भारत को आंख दिखाने की यह कोशिश वास्तव में बांग्लादेश की बदलती वैचारिक मानसिकता, उसकी दिशा, पाकिस्तान की साजिश और भारत की कमजोर कूटनीतिक चुनौतियों का संयुक्त परिणाम है। यह घटना एक चेतावनी भी है कि यदि भारत ने समय रहते अपनी रणनीति को मजबूत नहीं किया, तब उस स्‍थ‍िति में भविष्य में ऐसे और उदाहरण सामने आ सकते हैं, जहां भारत की सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझता जाता रहेगा।