जयपुर, 06 नवंबर । राजस्थान हाईकोर्ट ने रिश्वत के आरोप से जुडे केस में निजी सीए को राहत देते हुए उसके खिलाफ एसीबी की एफआईआर और आरोप पत्र सहित सभी कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने एसीबी की ट्रेप कार्रवाई व जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता के बीच पहले से वित्तीय लेन-देन तथा बकाया राशि का विवाद था। इसकी जानकारी उसने शिकायत में नहीं दी थी। एसीबी ने मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी करते हुए सीए के खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी, जबकि इन परिस्थितियों में उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7्र एवं आईपीसी की धारा 420 के जरूरी तत्व ही स्थापित नहीं होते। इसलिए उसके खिलाफ एसीबी की एफआईआर व चार्जशीट सहित अन्य सभी आपराधिक कार्रवाई को रद्द करना उचित होगा। जस्टिस वीके भारवानी ने यह आदेश सीए पुनीत मोहनोत की आपराधिक याचिका को मंजूर करते हुए दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच में आयकर विभाग में शिकायतकर्ता के किसी लंबित मामले और किसी लोक सेवक का शामिल होना भी सामने नहीं आ पाया है। दस्तावेजों से सीए की बकाया फीस और उधार की राशि की पुष्टि होती है। इसलिए वैध बकाया राशि मांगने को धोखाधड़ी नहीं कह सकते।
याचिकाकर्ता अधिवक्ता एसके पंवार ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता सीए और शिकायतकर्ता के बीच पूर्व में पेशेवर संबंध रहे थे। शिकायतकर्ता पर सीए की प्रोफेशनल फीस के 1,04,400 तथा व्यक्तिगत लोन के एक लाख रुपए सहित कुल दो लाख चार हजार रुपए बकाया थे। सीए ने एसीबी की ट्रेप कार्रवाई से पहले ईमेल से शिकायतकर्ता को बकाया राशि जमा कराने के लिए बैंक का विवरण भेजा था। एसीबी ने उसके खिलाफ झूठे तथ्यों पर गलत आपराधिक कार्रवाई की है, जिसे रद्द किया जाए। गौरतलब है कि शिकायतकर्ता ने आरोपी के खिलाफ एसीबी में शिकायत दी थी कि वह आयकर विभाग में लंबित काम करवाने के लिए रिश्वत मांग रहा है। एसीबी ने उसे 24 मई 2022 को दो लाख रुपए लेते हुए ट्रेप किया था, जबकि यह राशि उसकी स्वयं की ही बकाया थी। यह तथ्य शिकायतकर्ता ने छिपाया था।
