32 साल पुराने केस में दो पूर्व पुलिसकर्मी उम्रकैद: सीबीआई कोर्ट का फैसला!

अमृतसर में 32 साल पहले 1992 में हुए बलदेव सिंह उर्फ देबा और कुलवंत सिंह के फर्जी एनकाउंटर के मामले में, मोहाली की विशेष सीबीआई अदालत ने 4 फरवरी को दो पूर्व पुलिसकर्मियों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। इनमें तत्कालीन एसएचओ मजीठा, पुरुषोत्तम सिंह और एएसआई गुरभिंदर सिंह शामिल हैं। इन दोनों को हत्या और साजिश रचने के आरोप में दोषी साबित किया गया, जबकि इंस्पेक्टर चमन लाल और डीएसपी एसएस सिद्धू को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। इस मामले में, पुलिस अधिकारियों ने पहले दावा किया था कि बलदेव और कुलवंत कट्टर आतंकवादी थे, हालांकि हकीकत यह थी कि उनमें से एक सैनिक था और दूसरा 16 साल का नाबालिग।

यह मामला तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में सीबीआई को जांच का आदेश दिया। इस जांच में पाया गया कि बलदेव सिंह को 6 अगस्त 1992 को पुलिस ने उसके घर से उठाया और उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया। इसी प्रकार, लखविंदर सिंह को भी 12 सितंबर 1992 को गिरफ्तार किया गया और बाद में उसकी भी हत्या कर दी गई। दोनों युवकों के परिवार ने उनके लापता होने के बाद लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी, जिसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच की।

सीबीआई की जांच में खुलासा हुआ कि पुलिस ने बलदेव और लखविंदर को झूठा फंसाया। 23 जुलाई 1992 को हरभजन सिंह नाम के व्यक्ति की हत्या के मामले के लिए इन दोनों को गिरफ्तार दिखाया गया था; लेकिन सच्चाई यह थी कि उन्हें अवैध तरीके से हिरासत में लिया गया और बाद में फर्जी मुठभेड़ के दौरान मार दिया गया। सीबीआई ने पाया कि फर्जी मुठभेड़ दिखाने के लिए पुलिस ने सभी तथ्यों को मोड़ दिया था और किसी भी औपचारिकता का पालन नहीं किया।

जांच के दौरान यह भी पाया गया कि पुलिस द्वारा की गई मुठभेड़ के विवरण के बारे में लॉग बुक में कोई प्रविष्टि नहीं थी। इसके अलावा, बलदेव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उसकी तत्काल मृत्यु हो गई थी, जिससे यह साबित होता है कि उसकी पहचान की कहानी असत्य थी। अब तक इस मामले में 19 गवाहों की मौत हो चुकी है और कई आरोपियों को भी इस दौरान निधन हो गया था। अंततः, 32 वर्षों के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिला, जिससे साबित होता है कि समय चाहे कितना भी लगे, सच्चाई और न्याय की जीत होती है।

इस मामले में, सीबीआई ने 1999 में 8 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी, लेकिन समय के साथ अदालत में पेश किए गए गवाहों की संख्या कम होती गई। पीड़ित परिवार के वकील सरबजीत सिंह वेरका ने बताया कि न्याय के लिए लम्बी लड़ाई लड़ने में कई गवाहों की देरी से मौत हो गई थी। इसके बावजूद, अदालत का यह निर्णय उन सभी के लिए एक सशक्त संदेश है जो गलतफहमियों के कारण किसी भी तरह के अत्याचार का शिकार होते हैं। अब लोगों को उम्मीद है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई होगी, ताकि भविष्य में न्याय का यह द्वार हमेशा खुला रहे।